ईरान पर इजरायल और अमेरिका के हमले के बाद शुरू हुए युद्ध को अब एक महीना से ज्यादा हो चुका है, लेकिन अब भी तनाव और टकराव की आक्रामकता में कोई कमी नहीं देखी जा रही है। बीच-बीच में युद्ध विराम की बात उठती है और अगले ही दिन पहले से ज्यादा तीव्रता वाले हमलों के बीच गुम होकर रह जाती है।
खबरों के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के खर्ग द्वीप पर फिर हमला किया। इसके अलावा, ईरान के अल्बोर्ज प्रांत में हुए ताजा हवाई हमले में कम से कम अठारह लोगों की मौत हो गई। वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस धमकी ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है कि अगर ईरान मंगलवार रात आठ बजे तक होर्मुज जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बहाल नहीं करता है, तो उसके सभी बिजली संयंत्रों और पुलों पर बमबारी की जाएगी।
सवाल है कि क्या अमेरिका को इस बात की फिक्र है कि नागरिक ढांचों पर होने वाले हमलों को युद्ध अपराधों के दायरे में देखा जा सकता है। ईरान में हमले की वजह से एक स्कूल की कई बच्चियों की मौत को लेकर पहले ही अमेरिका-इजरायल के रवैये पर तीखे सवाल उठ चुके हैं। ऐसा लगता है कि इस युद्ध में हमले के ठिकाने चुनने के मसले पर मानवीयता के प्रश्न पीछे छूट गए हैं।
जहां इजराइल और अमेरिका की ओर से ईरान पर मिसाइल की मार करने से लेकर बमबारी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है, वहीं ईरान ने भी इजराइल सहित मध्य-पूर्व के देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमला करने में कोई कमी नहीं की है। इससे इतर युद्ध की वजह से मध्य-पूर्व के समूचे प्रभावित इलाके में जिस पैमाने पर कच्चे तेल का उत्पादन और उसका कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है, उसका असर समूची दुनिया पर किसी न किसी रूप में पड़ रहा है। बहुत सारे देशों में तेल, गैस और खाद की आपूर्ति बाधित हुई है।
विडंबना यह है कि यह सब देखने-समझने के बावजूद युद्ध को खत्म करने या कम से कम कुछ दिनों के विराम की बात भी ठोस तरीके से सिरा नहीं पकड़ रही है। एक ओर अमेरिका के राष्ट्रपति आए दिन ईरान में सब कुछ नष्ट कर देने की धमकी देते हैं, तो दूसरी ओर ईरान इसका जवाब देने की बात करता है।
तनाव के स्वरूप का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि ईरान ने पैंतालीस दिन के युद्धविराम के प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कहा कि वह युद्ध की स्थायी और पूर्ण समाप्ति तथा फिर से ईरान पर आक्रमण नहीं किए जाने की गारंटी चाहता है। एक तरह से ईरान की इस मांग को समझा जा सकता है कि कूटनीतिक प्रयासों की सार्थकता तभी है, जब किसी भी वार्ता के माध्यम से स्थायी समाधान तक पहुंचा जा सके।
अगर हल निकालने के लिए चल रही बातचीत में कोई तात्कालिक आश्वासन दिया जाता है और उसमें विश्वसनीयता की कमी होगी, तो ऐसे प्रयास युद्ध के मूल कारणों को दूर करने में नाकाम रहेंगे। बल्कि इसके विपरीत नतीजे भी निकल सकते हैं। जाहिर है, कुछ समय के युद्धविराम की गुंजाइश निकालने के बजाय संघर्ष को पूरी तरह खत्म करने के उपायों पर पहुंचने के उद्देश्य से बिना देर किए शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
मगर अभी युद्ध को लेकर जिस तरह की जिद देखी जा रही है, उससे किस तरह का समाधान निकाला जा सकता है। व्यापक पैमाने पर विनाश के बाद जब युद्ध थमेगा, तब किसी भी तरह के समाधान की कीमत क्या होगी?
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