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तस्करी के तंतु

मानव तस्करी के बढ़ते सिलसिले को रोकने के लिए कारगर उपाय जुटाने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जा रही है, मगर हकीकत यह है कि इस दिशा में अब तक..

Author नई दिल्ली | November 8, 2015 21:20 pm
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ़ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

मानव तस्करी के बढ़ते सिलसिले को रोकने के लिए कारगर उपाय जुटाने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जा रही है, मगर हकीकत यह है कि इस दिशा में अब तक पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा सके हैं। इसी का नतीजा है कि नाबालिग बच्चों के रहस्यमय ढंग से गायब हो जाने, नौकरी आदि के नाम पर महिलाओं को दूसरे देशों में बेच दिए जाने जैसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना कठिन बना हुआ है। भारत में मानव तस्करी का सिलसिला न रुकने पर अमेरिका ने भी चिंता जाहिर की है। वहां के विदेश मंत्रालय में मानव तस्करी पर निगरानी रखने वाले विभाग के उपनिदेशक ने कहा है कि भारत इस मामले में न्यूनतम मानकों के अनुरूप काम नहीं कर रहा।

कई मौकों पर अदालतें और मानवाधिकार आयोग भी सरकार को मानव तस्करी पर लगाम लगाने के पुख्ता इंतजाम करने का निर्देश दे चुके हैं, मगर सरकार की जैसे अदालतों की चिंताओं की अनदेखी करना आदत बन चुकी है, उसने इस मामले में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई है। जब कभी नाबालिग बच्चों के लापता होने या फिर महिलाओं को दूसरे देशों में भेजने के बड़े मामलों का खुलासा होता है, सरकार कुछ सख्त कदम उठाने का दम भरती है, पुलिस कुछ समय सक्रिय नजर आती है, फिर स्थिति जस की तस बन जाती है। मानव तस्करी पर रोक न लग पाने की वजह से न सिर्फ बच्चों और महिलाओं के मानवाधिकारों का हनन होता है, बल्कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा पैदा होता है।

छिपी बात नहीं है कि मानव तस्करी के शिकार ज्यादातर गरीब तबके के बच्चे होते हैं। इस धंधे में जुटे लोगों का संजाल इतना सघन और मजबूत है कि वे लगातार ऐसे परिवारों पर नजर रखते हैं, जिनके लिए अपने बच्चों का पालन-पोषण करना मुश्किल होता है। वे ऐसे परिवारों के बच्चों को बहला-फुसला कर, घरों, दुकानों, कारखानों आदि में काम दिलाने का लोभ देकर या फिर अगवा कर ले जाते हैं और यातना की एक ऐसी अंधेरी दुनिया में धकेल देते हैं, जहां से बाहर निकलने का रास्ता उन्हें जिंदगी भर नहीं दिखाई दे पाता। बहुत सारे बच्चे चोरी-छिपे दूसरे देशों में बेच दिए जाते हैं, जहां उन्हें बंधुआ मजदूर की तरह काम करना पड़ता है। बहुत सारे बच्चे भीख मांगने के धंधे में लगा दिए जाते हैं। इसमें सबसे अधिक यातना लड़कियों को झेलनी पड़ती है। उन्हें दैहिक शोषण झेलना पड़ता है, यौन व्यापार को मजबूर किया जाता है।

अनेक बच्चों को आतंकवादी संगठनों के हवाले कर दिया जाता है, जिन्हें वे फिदायीन के तौर पर तैयार करते हैं। इस तरह बेघर हुए बच्चों को न तो उचित भोजन मुहैया हो पाता है, न उनके स्वास्थ्य का समुचित ध्यान रखा जाता है। उन्हें हर वक्त प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। भारत संयुक्त राष्ट्र के बच्चों और स्त्रियों के मानवाधिकारों की रक्षा से संबंधित घोषणा पर वचनबद्ध है, मगर वह न्यूनतम मानकों के अनुसार भी इस दिशा में उपाय नहीं जुटा पा रहा तो चिंता स्वाभाविक है। दरअसल, मानव तस्करी पर रोक लगाने के लिए केंद्र और राज्यों की खुफिया एजंसियों, पुलिस और सीमा सुरक्षा बलों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। मगर हकीकत यह है कि इस मामले में अभी तक कोई कारगर तंत्र नहीं विकसित हो पाया है। बच्चों की गुमशुदगी या प्लेसमेंट एजंसियों की गड़बड़ियों की शिकायतों पर अमूमन स्थानीय पुलिस का रवैया टालमटोल का ही बना रहता है। ऐसे में मानव तस्करी करने वालों पर नकेल कसना मुश्किल बना हुआ है। सरकार को इन पहलुओं पर संजीदगी से विचार करने की जरूरत है।

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