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संपादकीयः अपने वतन में

अफगानिस्तान के जलालाबाद शहर में बीते रविवार को सिखों और हिंदुओं को निशाना बना कर जो हमला किया गया, वह गंभीर चिंता पैदा करता है। इस हमले में सिख और हिंदू समुदाय के उन्नीस लोग मारे गए और कई जख्मी हो गए।

Author July 5, 2018 06:57 am

अफगानिस्तान के जलालाबाद शहर में बीते रविवार को सिखों और हिंदुओं को निशाना बना कर जो हमला किया गया, वह गंभीर चिंता पैदा करता है। इस हमले में सिख और हिंदू समुदाय के उन्नीस लोग मारे गए और कई जख्मी हो गए। यह आत्मघाती हमला उस वक्त हुआ था जब सिखों और हिंदुओं का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिलने जा रहा था। इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन आइएस ने ली है। हालांकि कहा तो यह भी जा रहा है कि हमले के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजंसी आइएसआइ की साजिश है। भारत में अफगानिस्तान के राजदूत ने भी पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए कहा है कि अब वक्त आ गया है जब भारत और अफगानिस्तान को ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आतंकवाद फैलाने वालों से मुकाबला करना चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि अफगानिस्तान में जो भारतीय बचे हैं, उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। भारत सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा। अफगानिस्तान में पहले भी भारतीयों को निशाना बनाया गया है। ताजा हमले में मारे गए सिख समुदाय का एक व्यक्ति तो वहां अक्तूबर में होने वाले चुनाव में हिस्सा लेने की तैयारी में था।

शायद ही कोई हफ्ता ऐसा गुजरता हो जब अफगानिस्तान से किसी बड़े आतंकी हमले की खबर न आती हो। सरकारी ठिकानों, होटलों और सार्वजनिक स्थलों और सुरक्षा बलों पर लगातार आत्मघाती हमले हो रहे हैं। हालात इसलिए भी ज्यादा विकट हो गए हैं कि तालिबान के साथ अब आइएस ने भी ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए हैं। अफगान तालिबान को पाकिस्तानी खुफिया एजंसी आइएसआइ का पूरा समर्थन है। ऐसे में अफगान सुरक्षा बलों के लिए हालात से निपटना मुश्किल हो गया है। अफगानिस्तान में भारतीय हितों पर हमले इस बात का संकेत हैं कि सिखों और हिंदुओं के लिए अब वहां रह पाना संभव नहीं है। युद्ध-जर्जर अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत बड़ी भूमिका निभा रहा है। सड़क, बिजली, शिक्षा जैसे कई क्षेत्रों में भारत अफगानिस्तान को मदद दे रहा है। ऐसे में ये हमले भारत के लिए खुली धमकी हैं।

ढाई-तीन दशक पहले अफगानिस्तान में एक लाख से ज्यादा हिंदू और सिख थे। काबुल, कंधार और जलालाबाद में स्थानीय कारोबार में इनकी भागीदारी थी। लेकिन तालिबान राज के आतंक के बाद इनका पलायन शुरू हो गया। अब वहां तीन सौ से भी कम सिख परिवार रह गए हैं। हमलों से इनके घर तबाह हो गए हैं, कारोबार चौपट हो गया है और सब पर मौत की तलवार लटक रही है। ऐसे में इनकी सुरक्षा की फिक्र भारत सरकार को करनी ही चाहिए। जो लोग जान बचा कर यहां भाग आए हैं, उनके सामने सबसे बड़ी समस्या कड़े वीजा-नियमों की है। उन्हें यहां स्टे-वीजा लेना पड़ता है। इस वीजा के आधार पर हालांकि ये लंबे समय तक यहां रह सकते हैं; इसकी कोई निर्धारित समय-सीमा नहीं है। लेकिन स्टे-वीजा के लिए लोगों को धक्के खाने पड़ते हैं। कुल मिलाकर हालत यह है अफगानिस्तान में चैन से जी नहीं सकते और भारत में आसानी से रह नहीं सकते। स्टे-वीजा कोई स्थायी हल नहीं है। ऐसे में सरकार को ऐसा कारगर समाधान निकालने पर विचार करना चाहिए जिससे इनकी स्थायी वतन वापसी का रास्ता साफ हो सके।

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