न्यायपालिका लोकतंत्र का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्तंभ होता है, जो कानून के शासन को बनाए रखने और संविधान की मौलिकता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाता है। भारत में न्यायपालिका को न्याय का मंदिर कहा जाता है, जहां विवादों का निस्तारण कर नागरिक अधिकारों की रक्षा की जाती है। किसी भी तरह की परेशानी या जटिल परिस्थिति में नागरिकों के लिए न्यायपालिका अंतिम आस होती है। ऐसे में अगर न्यायिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर ही सवाल उठने लगे, तो उस भरोसे का क्या होगा, जो न्याय की उम्मीद पर टिका होता है।

यह चिंता सरकार के उन आंकड़ों से उपजी है, जिनमें कहा गया है कि देश के प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को वर्ष 2016 से अब तक मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ 8,600 से अधिक शिकायतें मिली हैं। सरकार की ओर से शुक्रवार को लोकसभा में यह जानकारी दी गई, जिसके मुताबिक वर्ष 2024 में सबसे अधिक शिकायतें दर्ज की गईं। यानी समय के साथ शिकायतों का यह सिलसिला बढ़ रहा है।

दरअसल, लोकतंत्र में न्यायपालिका से उम्मीद की जाती है कि वह निष्पक्षता, पारदर्शिता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम करेगी। नागरिक अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है, इसलिए वह जनता के लिए साहस और आत्मविश्वास का स्रोत भी होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शक्ति संतुलन बनाए रखने में भी इसकी भूमिका अहम है।

आम आदमी की न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक प्रणाली की शुचिता को बनाए रखना बेहद जरूरी है और यह तभी संभव हो पाता है, जब न्यायिक अधिकारियों का आचरण पूरी तरह पाक-साफ हो। इसमें दोराय नहीं कि विधायिका और कार्यपालिका की तुलना में आम नागरिक न्यायपालिका पर अधिक निर्भर रहते हैं, क्योंकि उन्हें न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा होता है। न्यायिक प्रक्रिया भी तभी निष्पक्ष और निर्भीक हो सकती है, जब वह किसी भी तरह के अनुचित हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त हो।

नियमानुसार उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों का निपटारा न्यायपालिका द्वारा ‘आंतरिक तंत्र’ के माध्यम से किया जाता है। वर्ष 1997 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दो प्रस्ताव पारित किए गए थे, जिनके तहत शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अनुपालन के लिए कुछ मानक और सिद्धांत निर्धारित किए गए थे। इनका पालन न होने पर आंतरिक प्रक्रिया के तहत संबंधित न्यायिक अधिकारियों पर कार्रवाई की जाती है। मगर, न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें बढ़ने का क्रम यह दर्शाता है कि आंतरिक जांच प्रक्रिया या तो धीमी है या फिर उसमें कोई बाधा उत्पन्न हो रही है। न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार के मामले यदाकदा सामने आते रहते हैं, लेकिन उनकी जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और समय सीमा का अभाव नजर आता है।

पिछले वर्ष मार्च में सामने आए एक न्यायाधीश के दिल्ली स्थित आवास पर जले हुए नोटों की गड्डी मिलने के मामले में अब तक कोई खास प्रगति न होने पर भी सवाल उठ रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर यह मामला किसी प्रशासनिक अधिकारी या आम नागरिक से जुड़ा होता, तो जांच प्रक्रिया अब तक काफी आगे पहुंच गई होती। इस स्थिति के पीछे उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों के मामलों में जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया का जटिल ढांचा भी एक बड़ा कारण है, जिसे सरल एवं स्पष्ट बनाए जाने की जरूरत है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया में नागरिकों का भरोसा कायम रहे।