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संपादकीयः अमेरिका को दो-टूक

भारत ने अब यह साफ कर दिया है कि रूस के साथ वह मिसाइल खरीद सौदे को अंतिम रूप देने के करीब है और किसी सूरत में इससे पीछे नहीं हटेगा।

Author September 4, 2018 1:39 AM
अमेरिकी चेतावनी और दबावों का भारत ने जिस तरह से दो-टूक जवाब दिया है, वह एक साहसिक कदम है।

भारत ने अब यह साफ कर दिया है कि रूस के साथ वह मिसाइल खरीद सौदे को अंतिम रूप देने के करीब है और किसी सूरत में इससे पीछे नहीं हटेगा। भारत सरकार का यह कदम और बयान इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि तीन दिन दिन बाद ही यानी छह सिंतबर से अमेरिका के साथ ‘टू प्लस टू’ यानी दोनों देशों के रक्षा और विदेश मंत्रियों की शिखर बैठक होने जा रही है। इस बैठक में ही अमेरिका को इस बारे में आधिकारिक रूप से बता दिया जाएगा कि भारत रूस के साथ इस सौदे को जल्द ही अंतिम रूप दे देगा। दोनों देशों के बीच होने जा रही इस शिखर बैठक की अहमियत इसलिए भी है कि इसका आयोजन भारत-अमेरिकी असैन्य परमाणु समझौते के दस साल पूरे होने पर किया जा रहा है। इस रणनीतिक बैठक में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मसलों पर चर्चा होगी। अमेरिका की सारी कवायद और जोर इस पर है कि वैश्विक मसलों और नीतियों पर भारत एक पक्के समर्थक के तौर पर उसका साथ देता रहे। ट्रंप ने पिछले साल दिसंबर में राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के तहत भारत को रक्षा क्षेत्र का अपना सबसे बड़ा सहयोगी करार दिया था। लेकिन रूस और ईरान के अमेरिका के साथ जिस तरह के तनावपूर्ण रिश्ते चल रहे हैं, उसमें अमेरिका चाहता है कि भारत इन दोनों देशों से संबंध को नहीं बढ़ाए, खासतौर से रक्षा क्षेत्र और द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्र में। इसलिए ट्रंप प्रशासन भारत पर रूस के साथ रक्षा सौदा नहीं करने के लिए दबाव डालता रहा है।

भारत रूस से एस-400 ट्रायम्फ मिसाइलों का जो बेड़ा खरीदने की तैयारी में है, वह वक्त की जरूरत है। इससे वायुसेना को और मजबूत बनाया जा सकेगा। दरअसल, अमेरिका ने प्रतिबंधों के जरिए अपने विरोधियों से निपटने का जो रास्ता निकाला है और इसके लिए जो खौफनाक कानून सीएएटीएसए बनाया है, वही भारत-अमेरिका के बीच विवाद का मुद्दा और समस्या बना हुआ है। यह कानून इस साल अप्रैल में लागू हुआ था। इसके तहत अमेरिका ने रूस और ईरान पर तमाम तरह के कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। जबकि इन दोनों देशों से ही भारत के गहरे रिश्ते हैं। रूस रक्षा क्षेत्र में भारत का पुराना और बड़ा सहयोगी रहा है। जबकि ईरान भारत को भारी मात्रा में और काफी सस्ता तेल देता है। इस बात को अमेरिका बखूबी समझता है। लेकिन सवाल है कि भारत कैसे अमेरिकी दबाव में आकर रूस और ईरान से रिश्ते तोड़ सकता है!

अमेरिकी चेतावनी और दबावों का भारत ने जिस तरह से दो-टूक जवाब दिया है, वह एक साहसिक कदम है। अपने रक्षा तंत्र और सेनाओं को मजबूत बनाने के लिए भारत को ही तय करना है कि उसे किस देश से क्या खरीदना है, क्या नहीं। अमेरिका चाहता है कि भारत केवल उसके साथ ही रक्षा सहयोग बढ़ाए, अन्य देशों के साथ नहीं। उसे लग रहा है कि रूस के साथ रक्षा खरीद की भारत की नीति कहीं अमेरिकी हितों को चोट न पहुंचाने लगे। अमेरिका भारत को इसलिए भी नहीं छोड़ना चाह रहा है कि चीन से मुकाबले के लिए वह भारत को एक बड़ा सहयोगी मानता है। हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में चीन ने जिस तेजी से अपने पैर पसारे हैं, उससे भी अमेरिका की चिंताएं बढ़ गई हैं और इसलिए वह भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ गठजोड़ को महत्त्व दे रहा है। लेकिन भारत की अपनी जरूरतें हैं। भारत की नीति यह रही है कि उसे जहां से बेहतर रक्षा सहयोग मिले, उसे हासिल करना चाहिए, वह चाहे रूस हो, फ्रांस हो या फिर अमेरिका।

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