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संपादकीयः सदन के सरोकार

बुधवार को राहुल गांधी की तरफ से हुए तीखे हमलों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को इस बात के लिए भी घेरा कि वह संसद क्यों नहीं चलने दे रही है।

Author March 5, 2016 4:25 AM
भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के बारे में पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के समय में भी संसद में आश्वासन दिया गया था।

बुधवार को राहुल गांधी की तरफ से हुए तीखे हमलों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को इस बात के लिए भी घेरा कि वह संसद क्यों नहीं चलने दे रही है। इससे पहले असम की एक रैली में भी उन्होंने यह मुद््दा उठाया था, और उससे पहले दिल्ली से मेरठ के लिए चौदह लेन के एक्सप्रेस-वे की आधारशिला रखने के बाद नोएडा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए। प्रधानमंत्री ने एक बार फिर इस मसले की तरफ ध्यान खींचा है तो इसके पीछे कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने के इरादे के साथ ही पिछले दो संसदीय सत्रों का काफी समय बेकार चले जाने की पीड़ा भी रही होगी।

पिछले साल मानसून सत्र में ललित मोदी प्रकरण और व्यापमं घोटाला छाया रहा था और इसकी वजह से बहुत-से विधेयकों पर चर्चा नहीं हो सकी थी। फिर सारी आस शीतकालीन सत्र पर आकर टिक गई। लेकिन शीतकालीन सत्र का भी निराशाजनक समापन हुआ। यह सत्र भी हंगामे से ही शुरू हुआ और हंगामे से ही खत्म। जैसे-तैसे कुछ विधेयक पारित हुए। पर विसलब्लोअर विधेयक, भ्रष्टाचार निरोधक संशोधन विधेयक, रीयल एस्टेट (नियमन एवं विकास) विधेयक, जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर विधेयक जैसे कई अहम विधेयक अधर में रह गए। अब इन्हें लेकर सारी उम्मीदें बजट सत्र पर टिकी हैं।

यह सही है कि संसद के कामकाज को किसी सरकारी महकमे के काम की तरह नहीं देखा जा सकता। कई बार किसी ज्वलंत मसले की तरफ देश का ध्यान खींचने या सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सदन की कार्यवाही बाधित करने या सदन का बहिष्कार करने का विपक्ष का व्यवहार समझा जा सकता है। पर कांग्रेस ने जिस तरह नेशनल हेरल्ड मामले को लेकर संसद की कार्यवाही ठप की थी उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता। दिल्ली हाईकोर्ट के किसी फैसले के पीछे सरकार का हाथ बताना बेतुका ही कहा जाएगा। पर विपक्ष में रहते हुए भाजपा का व्यवहार भी इससे अलग नहीं था। संसदीय कार्यवाही ठप करने का औचित्य साबित करने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। विचित्र है कि अब वह अपनी उन दलीलों को याद नहीं करना चाहती!

जीएसटी की पहल यूपीए सरकार ने की थी। अगर भाजपा ने चाहा होता तो जीएसटी पिछली सरकार के समय ही लागू हो गया होता। जिन राज्यों को जीएसटी पर एतराज था उनमें गुजरात अव्वल था। राज्यों की आपत्तियां दूर करने के लिए विधेयक के मसविदे में कई संशोधन किए गए हैं। शेष मतभेद भी दूर किए जा सकते हैं। कांग्रेस ने जीएसटी की अधिकतम सीमा तय करने तथा एक विवाद निपटारा तंत्र बनाए जाने जैसे कई अहम सुझाव दिए हैं। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी ऐसी राय दे चुके हैं। लिहाजा, इन्हें समाहित करते हुए जीएसटी पर आम राय बनाने का रास्ता साफ हो सकता है।

लोकसभा में भले सत्तापक्ष का बहुमत हो, पर राज्यसभा में नहीं है। लोकसभा में तो कांग्रेस को इतनी भी सीटें नहीं मिल पार्इं कि वह प्रतिपक्ष के नेता-पद की दावेदारी कर सके। इसलिए कई विधेयकों को लेकर यही सवाल बना रहता है कि क्या राज्यसभा की बाधा पार हो पाएगी? राजीव गांधी की सरकार के समय भी, जब सत्तापक्ष के पास रिकार्ड बहुमत था, राज्यसभा ही विपक्ष की ताकत होती थी। पर ऐसी स्थिति का इस्तेमाल सरकार को निरंकुश होने से रोकने के लिए होना चाहिए, न कि विधायी कामों को अटकाते रहने के लिए। संसद चले, यह विपक्ष की भी जिम्मेवारी है।

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