पंजाब के होशियारपुर जिले के एक गांव में बुधवार को आवारा कुत्तों के एक बच्ची पर हमले की घटना ने एक बार फिर सभी को झकझोर दिया है। कुत्तों के झुंड ने बच्ची को उस समय नोच कर मार डाला, जब वह स्कूल जाने के लिए घर से निकली थी। सवाल है कि अगर इलाके में कुत्ते आक्रामक हो गए थे, तो समय रहते स्थानीय शासन ने क्यों नहीं ध्यान दिया। जबकि जोखिम बन गए कुत्तों को लेकर शीर्ष अदालत की ओर से स्पष्ट आदेश दिए जा चुके हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि लोगों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। मगर यह दायित्वबोध किसी भी स्तर पर नहीं दिखता।

पंजाब में जो हुआ, वह कोई अकेली घटना नहीं है। पहले भी इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं। इन्हीं कारणों से लोगों का आक्रोश भी फूटा और हिंसक कुत्तों को निशाना बनाया गया। होशियारपुर जिले में आवारा कुत्तों का समूह हिंसक हो चुका है, तो उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी किसकी थी? समय रहते उनकी पहचान कर ली जाती और उन्हें आश्रय गृह में भेज दिया जाता, तो मासूम बच्ची की जान नहीं जाती।

यह एक विचित्र विडंबना है कि सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के बावजूद आवारा कुत्तों पर अंकुश लगाना सरकारी महकमों को जरूरी नहीं लगता है। अदालत में महीनों चली सुनवाई और उस पर आए निर्देशों के बाद भी आम लोगों, खासकर बच्चों की जान जोखिम में है।

देश भर में इस मुद्दे पर चिंता जताए जाने और मामले सुर्खियों में आने के बावजूद संबंधित विभागों और अधिकारियों का रवैया अब भी उदासीन दिखता है। रिहाइशी इलाकों से हिंसक कुत्तों को हटाने की कोई कवायद नहीं हो रही, तो इसे अब गंभीरता से लेना होगा।

अगर नगर निकाय और जिला प्रशासन निर्देशों की अवहेलना करेंगे, तो आखिर आम लोग कहां जाएंगे। निकायों से पूछा जाना चाहिए कि हिंसक हो गए कुत्तों को पकड़ने तथा उन्हें आश्रय गृहों में रखने की हिदायत दी गई थी, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ? आवारा कुत्ते आक्रामक हो रहे हैं, तो तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए। नगर निकायों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। इस दिशा में अब सभी स्तरों पर समन्वित प्रयास की जरूरत है।