पश्चिम एशिया में जारी युद्ध में एक ओर इजराइल-अमेरिका की तरफ से हमले में ईरान के तेल उत्पादन केंद्रों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी ओर ईरान के जवाब की जद में भी कतर, बहरीन और सऊदी अरब जैसे खाड़ी के कई तेल उत्पादक देश आ रहे हैं। इसके अलावा, ईरान ने होर्मुज समुद्री मार्ग को जिस तरह बाधित कर दिया है, उसका मुख्य असर तेल की आपूर्ति पर पड़ना शुरू हो चुका है।
हमलों की तीव्रता अगर बनी रही, तो केवल भारत नहीं, समूचे एशिया में तेल और गैस की कीमतें काफी बढ़ सकती हैं। एशिया के कई विकासशील देश शायद इसका बोझ नहीं उठा पाएंगे और नतीजतन उन्हें अपने यहां तेल और गैस की मांग को घटाने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में भारत के सामने भी अपने तेल और गैस की जरूरत भर आपूर्ति को बनाए रखने की बहुस्तरीय चुनौती आ खड़ी हुई है। तेल खरीद के मोर्चे पर भारत जिन नई परिस्थितियों से दो-चार है, उसमें अब स्वाभाविक ही नए विकल्प तैयार करना वक्त का तकाजा है।
दरअसल, व्यापार समझौते में अमेरिका ने जिस तरह भारत के सामने रूस से तेल नहीं खरीदने की शर्त लगाई, उससे स्थितियां ज्यादा जटिल हुईं। मगर युद्ध की वजह से पैदा हुई नई परिस्थिति में इस संदर्भ में फैसला लेने के लिए भारत स्वाभाविक ही अपनी जरूरतों के मुताबिक कदम बढ़ा रहा है। शायद यही वजह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता रोके जाने के बाद पैदा होने वाली स्थिति के मद्देनजर भारत को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए रूस या अन्य विकल्प की ओर देखने को लेकर अमेरिका ने नरम रुख अख्तियार किया है।
गौरतलब है कि भारत में एलएनजी यानी तरल प्राकृतिक गैस का पचास फीसद खाड़ी देशों से आता है, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन और खाद बनाने में किया जाता है। इसी तरह एलपीजी का साठ फीसद इन्हीं देशों से आता है। मगर जब से ईरान ने होर्मुज समुद्री मार्ग को बाधित किया है, तब से तेल और गैस की सहज आपूर्ति पर इसका व्यापक असर पड़ा है। हमले के कई दिनों बाद भी दोनों पक्षों की ओर से युद्ध विराम के लिए किसी तरह की पहल करने के संकेत नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में दुनिया के एक बड़े हिस्से में तेल और गैस का संकट खड़ा हो सकता है।
हालांकि भारत के पास अगले करीब दो महीने के लिए अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त भंडार है, लेकिन अभी जिस तरह युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका दिख रही है, उसके मद्देनजर पूर्व तैयारी की जरूरत है। इसी वजह से भारत ने अब अपनी ऊर्जा खरीद की रणनीति में काफी बदलाव किया है, ताकि किसी एक रास्ते के बाधित होने पर आपातकालीन आपूर्ति भी बाधित होने की स्थिति न पैदा हो।
फिलहाल भारत ने जहां रूस से तेल खरीदने का रास्ता खुला रखा है, वहीं अब इसके सामने पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका, मध्य एशिया और कई अन्य देशों से आपूर्ति को सहज बनाए रखने का विकल्प है।
इसके अलावा, आस्ट्रेलिया और कनाडा सहित कई अन्य देशों ने भी गैस आपूर्ति की पेशकश की है और मौजूदा संकट को देखते हुए भारत अपनी ऊर्जा साझेदारी के दायरे में विस्तार कर रहा है। जाहिर है, मुश्किल वक्त में भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के नए रास्ते तैयार किए हैं और उम्मीद है कि युद्ध की वजह से उपजे संकट की मार आम लोगों पर नहीं पड़ेगी।
