इस बात की आशंका पहले से ही थी कि ईरान पर इजराइल और अमेरिका के साझा हमले के बाद युद्ध का दायरा दूसरे क्षेत्रों में भी फैलेगा और इससे वैसे देश भी प्रभावित होंगे, जो इस जंग में भागीदार नहीं हैं। दोनों पक्षों के बीच घातक हथियारों के जरिए जारी हमले युद्ध के प्रत्यक्ष स्वरूप हैं, तो इसके समांतर अब ऐसे फैसले भी सामने आने लगे हैं, जो अगर लंबे समय तक टिके, तो इससे दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी।
गौरतलब है कि अमेरिका और इजराइल के हमले के जवाब में ईरान ने भी मिसाइलों के जरिए सैन्य हमलों का मोर्चा खोला हुआ है। मगर एक बड़े रणनीतिक फैसले के तहत उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को जिस तरह बंद कर दिया है, अगर जल्द ही उसे खोलने के लिए ठोस प्रयास नहीं हुए, तो कई देशों के सामने ऊर्जा का संकट गहरा सकता है। होर्मुज को एक सबसे महत्त्वपूर्ण समुद्री जलमार्ग माना जाता है, जहां से दुनिया भर में तेल और गैस आपूर्ति का करीब बीस से पच्चीस फीसद हिस्सा गुजरता है।
स्वाभाविक ही इस बात की आशंका अभी से जताई जाने लगी है कि अगर संकट गहराया, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और इसके बाद हवाई किराए, माल ढुलाई और खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही केंद्रीय बैंकों के सामने मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों में बदलाव करना एक मजबूरी की नीति बन सकती है। यानी होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग के बाधित होने का व्यापक और बहुस्तरीय असर पड़ सकता है। फिलहाल ईरान ने इस रास्ते से सिर्फ चीन को आवाजाही की अनुमति दी है और कहा है कि अन्य देशों के जहाजों, खासतौर पर इजराइल और अमेरिका के समर्थक देशों के टैंकरों को रास्ता नहीं दिया जाएगा।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि तेल और ऊर्जा के लिए जिन देशों की होमुर्ज जलडमरूमध्य के रास्ते पर निर्भरता है, वहां ईरान के इस फैसले का क्या प्रभाव पड़ सकता है। निश्चित तौर पर भारत पर भी इसका गंभीर असर पड़ेगा और अभी से इसका हल खोजने की कोशिश शुरू हो गई है, लेकिन जिस रास्ते से भारत अपने चालीस फीसद तेल की आपूर्ति पूरी करता है, उसमें तुरंत इसका नया विकल्प निकालने के लिए काफी मशक्कत करनी होगी।
होर्मुज जलडमरूमध्य को एक संकरे समुद्री रास्ते से ज्यादा आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था की ‘धड़कती नस’ और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसके बाधित होने पर कई देश इसके असर की जद में आएंगे। भारत के पास फिलहाल छह से आठ हफ्ते का तेल का पर्याप्त भंडार मौजूद है और इस बीच अगर होर्मुज का रास्ता खोलने के प्रयास सफल नहीं हुए, तो ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रूस से भी तेल खरीदने की कोशिश हो सकती है।
अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी हुई तो भारत के आयात खर्च में बड़ा इजाफा हो सकता है और इसके समांतर घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर गंभीर असर पड़ेगा। यह समझना मुश्किल नहीं है कि तेल या ऊर्जा के लिए होर्मुज के रास्ते पर निर्भर अन्य देश ईरान के फैसले से किस स्तर तक प्रभावित होंगे। ऐसे में समूचे पश्चिम एशिया में फैल चुके युद्ध को रोकने और तनाव को कम करने के उद्देश्य से इसमें शामिल पक्षों के साथ बिना देरी किए बातचीत की गुंजाइश निकालना सबसे जरूरी और प्राथमिक होना चाहिए।
