पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब केवल तेल, गैस और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे समुद्र की पारिस्थितिकी पर भी खतरा मंडराने लगा है। होर्मुज जलमार्ग की नाकेबंदी से दुनिया पर आर्थिक असर को लेकर तो आकलन लगातार किया जा रहा है, लेकिन इस क्षेत्र में लंबे समय तक जहाजों की आवाजाही बंद रहने से पैदा होने वाले संभावित पारिस्थितिकी नुकसान पर अब तक कम ही ध्यान दिया गया है।
हाल में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, बीती फरवरी से फारस की खाड़ी में खड़े डेढ़ हजार से अधिक वाणिज्यिक जहाज गंभीर पर्यावरणीय खतरा पैदा कर सकते हैं। इन जहाजों के स्थिर रहने से इनके बाहरी हिस्सों पर समुद्री जीवों और वनस्पतियों की परत जमा हो सकती है। जब ये जहाज अलग-अलग बंदरगाहों की ओर रवाना होंगे, तो इनके साथ समुद्री जीव नए क्षेत्रों में पहुंच सकते हैं, जिससे जैव-सुरक्षा के लिहाज से नया खतरा पैदा होने की आशंका है। यह अफसोसनाक है कि इस दोहरे खतरे से बेफिक्र होकर अमेरिका और ईरान अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं।
गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने को लेकर अंतरिम समझौता होने के बावजूद शांति वार्ता आगे नहीं बढ़ पा रही है। एक बार संघर्ष विराम पर सहमति बनने के बाद भी दोनों देशों की ओर से वार-पलटवार का सिलसिला जारी है। इसी का नतीजा है कि ईरान ने होर्मुज जलमार्ग को फिर से बंद कर दिया है और इसके जवाब में अमेरिका ने दोबारा पूरे क्षेत्र की नाकेबंदी कर दी है।
ईरान ने बीते सोमवार को दो टूक कहा कि जब तक अमेरिका उनकी शर्तों को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक वह होर्मुज जलमार्ग को फिर से नहीं खोलेगा। दरअसल, ईरान चाहता है कि अमेरिका नाकेबंदी हटाए, युद्ध से हुए नुकसान के लिए मुआवजा दे, आर्थिक प्रतिबंध खत्म करे और उसकी जब्त संपत्तियों को मुक्त करे। ईरान की इन शर्तों को लेकर अमेरिका कितना गंभीर है, इसका अंदाजा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा कि तेहरान के वार्ताकारों ने अब तक ऐसी कोई मांग नहीं उठाई है।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि दोनों देशों के बीच तनाव और संघर्ष का सबसे ज्यादा असर भारत समेत उन देशों को झेलना पड़ रहा है, जिनका सीधे तौर पर इससे कोई संबंध नहीं है। हालांकि पश्चिम एशिया में फिर से शांति कायम करने की जिम्मेदारी दोनों देशों की है, लेकिन युद्ध की शुरुआत चूंकि अमेरिका और इजराइल ने मिलकर की थी, इसलिए समाधान के रास्ते तलाशने का दायित्व भी उन पर ज्यादा है। सवाल अब वैश्विक आपूर्ति शृंखला के बाधित होने से उपजे संकट का ही नहीं है, बल्कि समुद्र के पर्यावरण का भी है।
लंबे समय तक जहाजों के एक ही स्थान पर स्थिर रहने और उसके बाद विभिन्न बंदरगाहों की ओर रवाना होने से उनके साथ समुद्री जीव, पौधे, परजीवी और अन्य रोगजनक सूक्ष्म जीव भी नए क्षेत्रों में पहुंच जाएंगे, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र, मत्स्य संसाधन, जलीय कृषि और तटीय उद्योग को भी नुकसान हो सकता है। यही नहीं, अगर तेल से भरे जहाजों पर बड़े हमले होते हैं, तो समुद्र में तेल फैलने से बड़े पैमाने पर जलीय जीवों को नुकसान होगा। ऐसे में जरूरी है कि अमेरिका और ईरान मानवीय तथा पर्यावरणीय संकट की गंभीरता को ध्यान में रखकर शांति वार्ता को सफल बनाने की दिशा में सकारात्मक सोच के साथ कदम आगे बढ़ाएं।
