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संपादकीयः दमन का चक्र

लोकतंत्र की मांग को लेकर आवाज उठाना चीनी शासन के खिलाफ बगावत माना जाता रहा है और चीनी शासक इसे बेरहमी से कुचलने में भरोसा करते हैं। 1989 में बेजिंग के थ्येनआनमन चौक पर प्रदर्शनकारियों को टैंकों से कुचलवा कर लोकतंत्र के लिए आवाज उठाने वालों को चीनी सत्ता ने सख्त संदेश दिया था।

Author Published on: May 30, 2020 12:36 AM
तानाशाही कानून के लागू होते ही चीन के खिलाफ मुंह खोलना हांगकांग के नागरिकों को भारी पड़ेगा।

चीन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ हफ्ते भर से हांगकांग में जिस बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, वे दुनिया के इस सबसे बड़े साम्यवादी देश के लिए कोई कम बड़ा खतरा नहीं हैं। पिछले साल छह महीने से भी ज्यादा समय तक चले विरोध प्रदर्शनों से हांगकांग की जनता ने स्पष्ट संदेश दे दिया था कि वह किसी भी कीमत पर चीन की सत्ता को स्वीकार नहीं करने वाली। लेकिन चीन शांत नहीं पड़ा और उसने पहले के मुकाबले अब और ज्यादा कठोर कानून बनाते हुए हांगकांग पर शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है। चीन की संसद ने गुरुवार को जो कठोर कानून पास किया है, वह न सिर्फ हांगकांग के नागरिकों की आजादी छीनने वाला है, बल्कि आने वाले वक्त में हांगकांग की अर्ध स्वायत्तता को भी खत्म कर सकता है। इस तानाशाही कानून के लागू होते ही चीन के खिलाफ मुंह खोलना हांगकांग के नागरिकों को भारी पड़ेगा। अब होगा यह है कि लोकतंत्र की मांग को अपराध और राष्ट्रविरोधी गतिविधि तथा आजादी की मांग को राष्ट्रद्रोह माना जाएगा। लेकिन क्या कानून और सेना की ताकत पर चीन हांगकांग के लोगों की आवाज कुचलने में कामयाब हो पाएगा? क्या हांगकांग पर कब्जा करने की चीन की रणनीति सफल हो पाएगी? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आसान नहीं है।

सवाल है कि चीन ने अभी ही हांगकांग पर कब्जे की योजना क्यों बनाई, जबकि पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना महामारी से लड़ रही है और चीन कोरोना फैलाने के आरोपों से घिरा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस संकट से ध्यान बंटाने के लिए चीन ने हांगकांग का पत्ता खेला हो। यह भी संभव है कि चीन ने देखा हो कि जब दुनिया कोरोना में उलझी है तो ऐसे में हांगकांग पर कब्जे के लिए इससे बढ़िया वक्त और क्या हो सकता है। पिछले साल चीन ने हांगकांग में अपराधियों के प्रत्यर्पण के लिए कानून बना दिया था, जिसके विरोध में छह महीने से भी ज्यादा समय तक लाखों लोग सड़कों पर उतरे रहे और अंतत यह कानून हांगकांग की संसद को वापस लेना पड़ा। चीन के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था।

लोकतंत्र की मांग को लेकर आवाज उठाना चीनी शासन के खिलाफ बगावत माना जाता रहा है और चीनी शासक इसे बेरहमी से कुचलने में भरोसा करते हैं। 1989 में बेजिंग के थ्येनआनमन चौक पर प्रदर्शनकारियों को टैंकों से कुचलवा कर लोकतंत्र के लिए आवाज उठाने वालों को चीनी सत्ता ने सख्त संदेश दिया था। सोलह लाख की आबादी वाला छोटा-सा देश हांगकांग दुनिया का बड़ा व्यापारिक केंद्र है और कई देशों ने इसे विशेष व्यापारिक दर्जा दे रखा है। हांगकांग में चीन आर्थिक उदारीकरण बनाए रखने का समर्थक तो है, पर राजनीतिक उदारीकरण का विरोधी है। कानून और ताकत के बल पर हांगकांग पर कब्जे की कोशिश चीन को भारी पड़ सकती है। चीन अपने साम्राज्य की विस्तारवादी नीति पर चल रहा है। ताइवान को लेकर पहले से विवाद है। दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक में वह पैर पसार चुका है। हांगकांग वैश्विक व्यापार का केंद्र होने की वजह से उसके लिए सबसे महत्तवपूर्ण है। ब्रिटेन ने 1997 में जब हांगकांग को चीन के हवाले किया था, तब चीन ने वादा किया था कि हांगकांग में लोकतंत्र की स्थापना होगी। इसीलिए अगर हांगकांग के नागरिक लोकतंत्र की मांग कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या है!

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