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संपादकीय: दावों के बरक्स

ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था बिगड़ते जाने को लेकर उठने वाले सवालों के बावजूद सरकार को इसकी परवाह नहीं है। मुठभेड़ों के जरिए अपराध और अपराधियों पर काबू पाने के दावों के बीच हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को रोकना मुश्किल बना हुआ है।

बस का अपहरण कर बदमाशों ने साबित कर दिया कि वे लचर कानून व्यवस्था से बेखौफ हैं।

पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में अलग-अलग अपराधों के मामले जिस तरह लगातार सुर्खियों में आ रहे हैं, उससे यही लगता है कि सरकार का दावा चाहे जो हो, हकीकत सवालों के घेरे में है। आखिर क्या वजह है कि अपराधियों के भीतर पुलिस और प्रशासन का कोई खौफ नहीं दिख रहा है और वे सरेआम किसी अपराध को अंजाम देने से नहीं हिचक रहे हैं। गौरतलब है कि मंगलवार की रात एक निजी बस गुरुग्राम से मध्यप्रदेश के पन्ना जा रही थी।

बुधवार तड़के आगरा में एक अन्य वाहन में सवार कुछ लोगों ने बस को रोका और अपना ड्राइवर बिठा कर यात्रियों सहित बस का अपहरण कर लिया। इस खबर से हड़कंप मच गया और स्वाभाविक रूप से यात्रियों के परिजनों के बीच दहशत फैल गई। हालांकि बाद में यात्रियों को भी बस से उतार दिया गया और उन्हें छोड़ दिया गया था।

अगले दिन वह बस इटावा के एक ढाबे पर खाली मिली। पहले यही खबर आई थी कि सवारियों से भरी बस को ऋण मुहैया कराने वाली एक निजी फाइनेंस कंपनी के कर्मचारियों ने अगवा कर लिया है, ताकि वे कर्ज की वसूली कर सकें। लेकिन अब इसके पीछे बस मालिकों और अपहरणकर्ताओं के बीच पैसों के लेन-देन का मामला बताया जा रहा है।

दरअसल, शुरुआती खबरों के मुताबिक एक निजी फाइनेंस कंपनी की ओर से वसूली के लिए बस को अगवा करने की बात पर सहज ही लोगों को विश्वास हो गया था। वजह यही है कि पहले भी ऋण की वसूली के लिए निजी कंपनियों की ओर से गुंडे भेज कर धमकी देने या वाहन छीन लेने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। लेकिन जब पुलिस ने अपनी दबिश बढ़ाई और मुठभेड़ में एक मुख्य आरोपी को घायल करके गिरफ्तार किया, तब जाकर यह बात सामने आई कि घटना बस मालिक और अगवा करने वालों के बीच बड़ी रकम के लेन-देन से जुड़ी है।

जाहिर है, यह सीधे-सीधे कानून को ताक पर रख कर बिना किसी भय के आपराधिक घटना को अंजाम देने का मामला है। सवाल है कि किसी भी स्थिति में यात्रियों सहित बस को अगवा कर लेने की हिम्मत अपराधियों के भीतर आखिर कहां से आई! गनीमत यह रही कि अपहरणकर्ताओं ने किन्हीं वजहों से खुद ही बस के यात्रियों और बाद में बस को छोड़ दिया। वरना आम आपराधिक घटनाओं के दौरान ऐसी स्थितियों में क्या हो सकता है, इसका बस अंदाजा लगाया जा सकता है।

अफसोसनाक यह है कि फिल्मी अंदाज में सड़क पर एक बस को अगवा कर लिया जाता है और उसे लंबी दूरी तक बिना किसी रोकटोक के ले जाया जाता है। क्या इस बीच कहीं भी पुलिस या प्रशासन की ओर से जांच या पूछताछ की व्यवस्था नहीं थी? जिस दौर में महामारी से लड़ाई के दौरान हर तरफ कानून-व्यवस्था को चाक-चौबंद रखने की बात कही जा रही है, ऐसे में यात्री सहित बस के अपहरण के इस वारदात को कैसे देखा जाएगा!

ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था बिगड़ते जाने को लेकर उठने वाले सवालों के बावजूद सरकार को इसकी परवाह नहीं है। मुठभेड़ों के जरिए अपराध और अपराधियों पर काबू पाने के दावों के बीच हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को रोकना मुश्किल बना हुआ है। सत्ता में आने से पहले भाजपा ने राज्य को अपराधों से मुक्त कराने के जो वादे किए थे, उसकी हकीकत अक्सर सामने आती रही है। मगर आपराधिक घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी क्या दर्शाती है? क्या दावों के बरक्स राज्य सरकार और पुलिस के भीतर अपराधों से निपटने की इच्छाशक्ति में कमी है?

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