संपादकीयः मौसम की मार - Jansatta
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संपादकीयः मौसम की मार

हर साल गरमी में बढ़ते तापमान के साथ लू के थपेड़ों से बड़ी तादाद में लोगों के बीमार होने और मरने की खबरें आने लगती हैं। कई बार इसके असर से मरने वालों की तादाद काफी हो जाती है।

Author April 30, 2016 2:58 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

हर साल गरमी में बढ़ते तापमान के साथ लू के थपेड़ों से बड़ी तादाद में लोगों के बीमार होने और मरने की खबरें आने लगती हैं। कई बार इसके असर से मरने वालों की तादाद काफी हो जाती है। मगर अभी तक इसे भूकम्प या बाढ़ जैसी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं माना जाता और न ही सरकार इसे लेकर बहुत फिक्रमंद दिखती है। इस साल गरमी के शुरुआती दौर में ही हालत यह है कि देश के कई हिस्सों में तापमान अड़तालीस डिग्री सेल्सियस के पार हो गया और भीषण गरमी के साथ लू के थपेड़ों से लोगों की जान जा रही है। सिर्फ पिछले दो दिनों के दौरान तेलंगाना और ओड़िशा में लू का शिकार होकर और डेढ़ दर्जन लोगों के मारे जाने की खबरें हैं।

उत्तर भारत के कई राज्यों में तापमान में बढ़ोतरी जारी है और ओड़िशा के भुवनेश्वर में तापमान जहां 45.3 डिग्री दर्ज किया गया, वहीं टिटलागढ़ में यह आंकड़ा 48.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। टिटलागढ़ में यह तापमान पिछले सत्रह सालों के दौरान उच्चतम है। तेलंगाना से अब तक एक सौ सैंतीस लोगों के मारे जाने की खबरें आ चुकी हैं। इसके अलावा, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में भी जानलेवा लू के थपेड़े चल रहे हैं।

गरमी के मौसम के शुरुआती दौर में ही जब यह हाल है, तो आने वाले दिनों को लेकर अंदाजा लगाया जा सकता है। बिहार में तो हालत यह है कि अनेक जगहों से आग लगने से सैकड़ों झोपड़ियां जल जाने की घटनाएं सामने आर्इं। इसके मद्देनजर सरकार को आदेश जारी करना पड़ा कि चूंकि ज्यादा तापमान के कारण चूल्हे से निकली एक मामूली चिंगारी भी बड़े अग्निकांड की वजह बन सकती है, इसलिए लोग अपने खाना बनाने के वक्त का ध्यान रखें और सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक चूल्हा न जलाएं।

इस संबंध में अदालतों ने समय-समय पर सरकारों की हिदायत दी है कि वे ऐसा इंतजाम करें, ताकि मौसम की मार से किसी व्यक्ति की मौत न हो। मगर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि सन 2000 से 2014 के बीच लू की वजह से सोलह हजार से ज्यादा लोगों की जान चली गई। अकेले 2015 में इसके चलते करीब सवा दो हजार लोग मारे गए। विडंबना है कि सरकार जिस तरह किसी अन्य प्राकृतिक आपदा के समय सक्रिय हो जाती है और पूर्व तैयारी से लेकर बचाव कार्य तक के मोर्चे पर जरूरी एहतियात बरती जाती है, उसके बरक्स गरमी की मार का सामना करने के लिए अब तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।

दरअसल, प्राकृतिक आपदा प्रबंधन कानून 2005 और आपदा प्रबंधन पर राष्ट्रीय योजना 2009 में गरमी की वजह से खड़ी होने वाली इतनी बड़ी समस्या को राष्ट्रीय आपदा नहीं माना गया है। शायद यही वजह है कि सरकार इसे कोई बड़ी समस्या मान कर इस पर ध्यान नहीं देती है। जबकि कड़ाके की ठंड में चौक-चौराहों पर आग जलाने से लेकर रैन बसेरे बनाने या फिर कंबल बांटने तक के कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इस साल अपने गठन के इतिहास में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने पहली बार अप्रैल से जून में चलने वाली गरमी की लहर के लिए चेतावनी और सुझाव जारी किए हैं। लेकिन लू के थपेड़ों से निपटने के लिए कोई इंतजाम करना जरूरी नहीं समझा गया।

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