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चंदे का स्रोत

दिल्ली उच्च न्यायालय के ताजा आदेश ने स्वाभाविक ही कई राजनीतिक दलों खासकर भाजपा और कांग्रेस को एक परेशानी में डाल दिया है।

कांग्रेस और भाजपा।

दिल्ली उच्च न्यायालय के ताजा आदेश ने स्वाभाविक ही कई राजनीतिक दलों खासकर भाजपा और कांग्रेस को एक परेशानी में डाल दिया है। न्यायालय ने विदेशी चंदे का पता लगाने के लिए केंद्र सरकार को कांग्रेस और भाजपा समेत राजनीतिक दलों के खातों की जांच के लिए छह महीने का वक्त दिया है, और कहा है कि यह 2014 के उसके आदेश के अनुपालन के लिए गृह मंत्रालय को ‘अंतिम मौका’ है। इस सिलसिले में दो तथ्य गौरतलब हैं। एक यह कि एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम की धारा 4 के मुताबिक कोई भी पार्टी या विधायक/सांसद विदेशी अंशदान यानी विदेशी स्रोत से चंदा नहीं ले सकता। दूसरा, अदालत ने 2014 में पाया कि कांग्रेस और भाजपा ने ब्रिटेन स्थित वेदांता रिसोर्सेज कंपनी से चंदा लेकर इस अधिनियम का उल्लंघन किया था। साथ ही अदालत ने निर्वाचन आयोग और गृह मंत्रालय को आदेश दिया था कि विदेशी चंदे की छानबीन के लिए दोनों पार्टियों के खातों की जांच करें और छह महीनों के भीतर कार्रवाई करें। लेकिन इस आदेश को तीन साल हो गए, कुछ नहीं हुआ। अब तक सिर्फ टालमटोल होता रहा है। क्या इसलिए कि इसमें सत्ताधारी पार्टी भी आरोपी है? पारदर्शिता और शुचिता की वकालत करने वाली राजग सरकार की विडंबना देखिए कि उसने अदालत में दलील दी थी कि उसे रिकार्ड खंगालने के लिए 31 मार्च 2018 तक का वक्त दिया जाए। आनाकानी का इससे अच्छा नमूना और क्या होगा?

इस मामले में विपक्ष भी खामोश रहा है। क्या इसलिए कि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की भी पूंछ दबी हुई है? जनतांत्रिक सुधारों के लिए काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन एडीआर यानी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की याचिका पर यह मामला शुरू हुआ था। सत्ताधारी पार्टी की एक खास दलील यह थी कि उसने स्टरलाइट इंडस्ट्रीज और गोवा सेस से चंदा लिया था, जो कि वेदांता रिसोर्सेज की भारतीय शाखाएं हैं, इसलिए इनसे लिये चंदे को एफसीआरए का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता। पर यह दलील अदालत में टिकी नहीं, तो टालमटोल की रणनीति अपना ली गई। विचित्र है कि एक तरफ एफसीआरए के तहत विदेशी अनुदान पाने वाली स्वयंसेवी संस्थाएं सरकार की आंख की किरकिरी बन गई हैं; पिछले तीन साल में थोक में ऐसी संस्थाओं के एफसीआरए लाइसेंस रद््द किए गए हैं, जिनमें ज्यादा तादाद मानवाधिकारों तथा पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्थाओं की है। और दूसरी तरफ, सरकार को राजनीतिक दलों द्वारा एफसीआरए का उल्लंघन तनिक नहीं खटकता!

यह सही है कि सारी स्वयंसेवी संस्थाएं पाक-साफ नहीं है; कई निहित स्वार्थ साधने और कई काले धन को सफेद बनाने का जरिया होंगी। उनकी जरूर छानबीन होनी चाहिए, उनके खिलाफ कार्रवाई भी। पर यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि ईमानदारी से अपना काम करने वाली संस्थाओं पर आंच न आए। फिर, दूसरा सवाल है कि राजनीतिक दलों से भी एफसीआरए की कसौटी पर खरा उतरने की मांग क्यों न की जाए? जबकि देश की दोनों सबसे बड़ी पार्टियां इस मामले में कठघरे में खड़ी हैं!

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