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संपादकीयः उम्मीदवारी व नाउम्मीदी

राज्यसभा चुनाव के लिए आप यानी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों को लेकर विवाद होना और सवाल उठना स्वाभाविक है।

Author January 5, 2018 03:11 am
RTO ऑफिस में पार्नाटी के कार्यकर्ताओं से बात करते कुमार विश्वास

राज्यसभा चुनाव के लिए आप यानी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों को लेकर विवाद होना और सवाल उठना स्वाभाविक है। कुछ समय से उम्मीदवारी के लिए जो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में थे, उनमें से संजय सिंह को छोड़ कर बाकी सब को किनारे कर दिया गया। कोई पार्टी राज्यसभा या किसी सदन के लिए किसे अपना प्रत्याशी बनाती है, यह उसका आंतरिक मामला हो सकता है। आमतौर पर सभी दल यही दलील पेश करते रहे हैं। लेकिन आप की ओर से जो दो नए नाम सामने आए हैं, उनके चुनाव पर न केवल दूसरे दलों को पार्टी पर अंगुली उठाने का मौका मिला है, बल्कि शुरुआती दिनों से पार्टी के साथ रहे और अब किसी न किसी वजह से बाहर हो गए कई लोगों ने भी हैरानी जताई है। माना जा रहा था कि पार्टी नेता आशुतोष के अलावा, मतभेद की तमाम खबरों के बावजूद, कुमार विश्वास को राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया जा सकता है। लेकिन तमाम कयासों को दरकिनार कर संजय सिंह के अलावा सुशील गुप्ता और नारायण दास गुप्ता को चुना गया।

इनमें संजय सिंह आप के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। लेकिन सुशील गुप्ता को एक बड़े व्यवसायी के रूप में ही जाना जाता है। वे एक महीने पहले तक कांग्रेस के साथ थे और आप के खिलाफ अभियान में शामिल रहे। नारायणदास गुप्ता पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और इंस्टीट्यूट आॅफ चार्टर्ड अकाउंटेंट आॅफ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके हैं। इनमें ज्यादा सवाल सुशील गुप्ता के नाम पर उठे हैं। लेकिन आप नेता मनीष सिसोदिया ने शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके योगदान का हवाला देकर इस चयन को सही बताने की कोशिश की है। बहरहाल, ये नाम चुने जाने के बरक्स खबर यह भी आई कि आप की ओर से रघुरामन राजन, शरद यादव और कैलाश सत्यार्थी के अलावा मीडिया और न्यायपालिका जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से कई बड़ी शख्सियतों से राज्यसभा जाने के लिए संपर्क किया गया, लेकिन उनमें से कोई तैयार नहीं हुआ। अगर इसमें सच्चाई है तो आम आदमी पार्टी को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर किन वजहों से लोगों का भरोसा उस पर से डिग रहा है।

हालांकि अनेक पार्टियों पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि किसी को मोटी रकम के बदले टिकट दिया गया या फिर उनकी आर्थिक हैसियत का खयाल रखा गया। लेकिन आम आदमी पार्टी ने भी अगर देश की राजनीति में घर कर रही एक घातक प्रवृत्ति से बचने की कोशिश नहीं की तो उस पर सवाल ज्यादा तीखे होंगे। आखिर आप के गठन के समय या उससे पहले से ही इसके नेता अरविंद केजरीवाल का सबसे बड़ा दावा क्या रहा है? भारतीय राजनीति में पसरे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के साथ ही उन्होंने लोगों के बीच एक नई राजनीति की शुरुआत के लिए भी उम्मीद जगाई थी। इसके उलट, आज अगर वे पैसे लेकर टिकट बांटने के अलावा अपनी पार्टी के ही कई नेताओं पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की विश्वसनीय काट नहीं कर पा रहे हैं तो इसकी क्या वजह हो सकती है? ऐसा लगता है कि वक्त गुजरने के साथ-साथ आप और उसके नेताओं को अपनी साख की कोई फिक्र नहीं रह गई है। और यह पार्टी भारतीय राजनीति की उन्हीं बीमारियों से दिनोंदिन और भी ग्रसित होती जा रही है जिन्हें दूर करने काउसने दावा किया था।

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