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संपादकीयः चमत्कार को नमस्कार

लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार मदर टेरेसा को संत का दर्जा मिलने का रास्ता साफ हो गया है। वेटिकन ने उन्नीस साल बाद यह फैसला सुनाया है।

Author March 17, 2016 2:42 AM
मदर टेरेसा

लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार मदर टेरेसा को संत का दर्जा मिलने का रास्ता साफ हो गया है। वेटिकन ने उन्नीस साल बाद यह फैसला सुनाया है। स्वाभाविक ही इस निर्णय से मदर टेरेसा को चाहने वाले खुश हैं। मदर टेरेसा को संत का दर्जा दिलाने का प्रयास उनकी मृत्यु के बाद जोरशोर से शुरू हो गया था। वेटिकन के नियमों के मुताबिक संत का दर्जा उसी व्यक्ति को दिया जाता है, जिसने अपने जीवन में कम से कम दो चमत्कार अवश्य किए हों। इसके लिए मदर टेरेसा के जिन चमत्कारों का उल्लेख किया गया उनमें से थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद दो को वेटिकन ने प्रामाणिक माना। उनमें एक चमत्कार यह था कि मदर टेरेसा ने पश्चिम बंगाल की एक आदिवासी महिला को असाध्य रोग से मुक्ति दिलाई थी। दूसरा चमत्कार यह माना गया कि मदर टेरेसा की प्रार्थनाओं और उनकी दैवीय शक्ति की वजह से ब्राजील के एक व्यक्ति के मस्तिष्क का कैंसर ठीक हो गया था।

मदर टेरेसा ने गरीबों, दुखियों, खासकर बच्चों के लिए जो सेवा कार्य किए, निस्संदेह वे उल्लेखनीय हैं। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में गरीब, बेसहारा और दुखियारों के लिए आश्रम खोले। चिकित्सा करके उन्हें स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्रदान किया। मदर टेरेसा के काम की दुनिया भर में प्रशंसा हुई। इसके लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने अपने सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया। मदर टेरेसा के प्रति दुनिया भर के लोगों में सम्मान की भावना है। लाखों लोग उनके अनुयायी हैं। ऐसा आदर कम लोगों को मिलता है।

मदर टेरेसा को संत का दर्जा देकर निस्संदेह वेटिकन ने उनके प्रति सम्मान में वृद्धि की है। मगर जिस तरह उन्हें चमत्कारों के आधार पर यह उपाधि दी गई है, उससे यह आशंका स्वाभाविक है कि उनके साथ कुछ अंधविश्वास न जुड़ जाएं। अक्सर देखा जाता है कि जब लोगों को पता चलता है कि किसी व्यक्ति में चमत्कार की शक्ति है तो वे अपनी मनोकामनाएं लेकर वहां जुटना शुरू हो जाते हैं। भारत में अनेक मंदिरों, मजारों वगैरह में ऐसी ही मान्यताओं के चलते भीड़ जमा होती है। फिर ऐसी जगहों पर किस तरह धर्म का कारोबार चलाने वाले अपनी जगह बनाना शुरू कर देते हैं और अंधविश्वास फैलाने में योगदान करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। मदर टेरेसा ने मानवीय संवेदना के चलते लोगों की सेवा की। जीवित रहते उन्होंने कभी ऐसा दावा नहीं किया कि वे चमत्कार करती या कर सकती हैं। उनका जीवन प्रचलित संत-महात्माओं से अलग था। मनुष्य मात्र की सेवा में समर्पित।

अगर संत का दर्जा मिलने के बाद उनके नाम पर भी उपासनागृह बनने लगें, वहां चमत्कारों के दावे होने लगें तो उससे मदर टेरेसा के काम का अवमूल्यन ही होगा। अब यह जिम्मेदारी उनके अनुयायियों की है कि वे किस तरह मदर टेरेसा के जीवन भर के त्याग और मानवीय कार्यों को अंधविश्वासों की परत में लिपटने से बचाएं। मदर टेरेसा ने जब विदेशी मदद से दीन-दुखियों की सेवा के लिए आश्रम और चिकित्सालय चलाने शुरू किए तो उन पर भारत में ईसाई धर्म के प्रचार का आरोप लगा था। ऐसी ही कोई तोहमत अब उन पर न लगने पाए, इसका ध्यान रखना होगा। मदर टेरेसा का काम अनुकरणीय है, उनके दिखाए रास्ते पर चल कर अनेक कल्याणकारी कार्य किए जा सकते हैं, अगर यही लक्ष्य रहे तो सार्थक होगा।

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