उत्तर और मध्य भारत के दस से अधिक राज्य इन दिनों भीषण गर्मी से तप रहे हैं। अधिकांश स्थानों पर पारा 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जा पहुंचा है। लोग गर्मी से निजात पाने के लिए मैदानों से पहाड़ की ओर जाते हैं, लेकिन अब कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में भी लू चलने जैसी स्थिति पैदा हो गई है। उत्तर प्रदेश के बांदा में जहां अधिकतम तापमान 47 डिग्री को पार कर गया है, वहीं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गुरुवार की रात पिछले चौदह वर्षों में सबसे गर्म रही।

बढ़ते तापमान की तपिश ने न केवल आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है, बल्कि इससे कृषि का कार्य भी प्रभावित हो रहा है और कई जगह फसलों को नुकसान हो रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि हर साल मौसम में इतना ज्यादा उतार-चढ़ाव आखिर क्यों हो रहा है। जाहिर है कि यह जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक ताप का ही नतीजा है, जिससे मौसम का प्राकृतिक चक्र प्रभावित हो रहा है।

तापमान का बढ़ना सिर्फ मनुष्य और अन्य जीव-जंतुओं को शारीरिक रूप से ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसका असर व्यापक होता है। अत्यधिक गर्मी से प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगते हैं, जिससे पेयजल संकट पैदा हो जाता है। सिंचाई के बिना फसलें बर्बाद हो जाती हैं और कई दफा बुआई का कार्य भी प्रभावित होता है।

यही नहीं, झुलसा देने वाली गर्मी के कारण लोग घरों से कम निकलते हैं और बाजारों की रौनक गायब हो जाती है। नतीजतन व्यापारिक गतिविधियां सुस्त पड़ जाती हैं और इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। गर्मी की सबसे ज्यादा मार गरीब तबकों को ही झेलनी पड़ती है, जिनके पास संसाधनों की कमी होती है। सरकार की ओर से ऐसे लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

इस बात पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए कि आखिर मैदानों के साथ अब पहाड़ भी क्यों तपने लगे हैं। मौसम विज्ञानियों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की अंधाधुंध कटाई, अवैज्ञानिक तरीके से खनन और पर्यटक वाहनों के बढ़ते दबाव से स्थानीय मौसम चक्र में बदलाव हो रहा है। ऐसे में अगर अब भी हम नहीं संभले, तो निकट भविष्य में इसका परिणाम भयावह हो सकता है।