पश्चिम एशिया में हालात सामान्य नहीं हो पाने का असर अब प्रत्यक्ष रूप से महंगाई में तेज बढ़ोतरी के रूप में सामने आ रहा है। देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार इजाफे के बाद सरकार ने घरेलू रसोई गैस के दामों में भी 29 रुपये प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी कर दी है। यानी महंगाई की आंच आम लोगों की रसोई तक पहुंच गई है, जो आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।

इस स्थिति को लेकर पहले से ही अनुमान लगाए जा रहे थे, लेकिन सवाल सरकार के उन दावों पर उठ रहे हैं, जिनमें कहा गया था कि संभावित संकट का सामना करने के लिए समय रहते वैकल्पिक उपाय तलाश लिए जाएंगे। दरअसल, होर्मुज जलमार्ग के बाधित होने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है, जिससे भारत समेत दुनिया के कई देशों में ऊर्जा का संकट खड़ा हो गया है।

भारत पर इसका ज्यादा असर इसलिए पड़ रहा है, क्योंकि यहां आयात पर निर्भरता अधिक है। यह सब ज्ञात होने के बावजूद अगर महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए कारगर कदम उठाने के बजाय इसका बोझ जनता पर डाल दिया जाए, तो क्या इसे उचित ठहराया जा सकता है।

सरकार ने पिछले माह चार चरणों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए थे, जिसके परिणामस्वरूप कुल मिलाकर पेट्रोल 7.35 रुपये और डीजल 7.53 रुपये प्रति लीटर महंगा हो गया था। इसी तरह व्यावसायिक गैस सिलेंडर के दामों में भी बढ़ोतरी की गई।

उम्मीद की जा रही थी कि घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम फिलहाल स्थिर रहेंगे, लेकिन ऐसा लगता है कि आवश्यक वस्तुओं के दाम अब सरकार के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में तीन महीनों में दूसरी बार बढ़ोतरी की गई है। इससे पहले मार्च में साठ रुपए प्रति सिलेंडर की वृद्धि की गई थी, यानी इस अवधि में प्रति सिलेंडर कुल मिलाकर 89 रुपये बढ़ चुके हैं।

सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कीमतों में लगातार उछाल की वजह से तेल कंपनियों को नुकसान हो रहा है। ऐसे में यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस के दाम घटते हैं, तो क्या उनका लाभ आम उपभोक्ताओं को दिया जाता है? यह मसला लंबे समय से कई स्तरों पर उठाया जाता रहा है, लेकिन इस पर कोई गंभीरता अब तक नजर नहीं आई है।

घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दामों में बढ़ोतरी के बाद सरकार अब यह कहकर अपनी पीठ थपथपा रही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में तेज उछाल के बावजूद देश की जनता को रसोई गैस दुनिया के अन्य देशों की तुलना में सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही है।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक तरफ आम आदमी महंगाई के बोझ तले दबता जा रहा है और दूसरी तरफ सरकार यह दिखाने का प्रयास कर रही है कि आवश्यक वस्तुओं के दाम अब भी नियंत्रण में हैं।

खबरों के मुताबिक, संकट के दौरान देश में एलपीजी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए घरेलू उत्पादन में साठ फीसद से अधिक की वृद्धि की गई है और अमेरिका, कनाडा तथा अल्जीरिया जैसे देशों से अतिरिक्त आयात की व्यवस्था भी की गई है। मगर सवाल यही है कि इन वैकल्पिक उपायों का असर जमीन पर नजर क्यों नहीं आ रहा है। आम लोगों खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को लंबी कतारों में खड़े होकर गैस सिलेंडर का इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?