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संपादकीय: सेहत की सूरत

इसमें दो राय नहीं कि अब तक चिकित्सा संबंधी पढ़ाई और प्रशिक्षण के क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता का दावा कमोबेश सही रहा है। इसके बावजूद आज भी कई स्तरों पर कमियां दर्ज की जा रही हैं और अच्छा यह है कि उस पर गौर करके उसे दूर करने की कोशिश भी हो रही है।

राजनीतिभारत में स्वास्थ्य सेवाओं की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है।

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। यह तब ज्यादा साफ होकर उभरती है, जब अचानक ही सेहत संबंधी कोई बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। हालांकि अपनी सीमा में समूचा तंत्र चुनौतियों का सामना करने की कोशिश करता है, लेकिन अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं, जब लगता है कि हमारा स्वास्थ्य तंत्र न केवल संसाधनों, बल्कि सेवा संबंधी कमियों की वजह से भी संतोषजनक नहीं है। शायद इसी तरह की समग्र तस्वीर पर गौर करने के बाद संसद की एक स्थायी समिति ने स्वास्थ्य देखरेख की वास्तविकता का पता लगाने और उपलब्ध मानव संसाधनों का उपयोग करने में देश के वर्तमान स्वास्थ्य ढांचे को विफल बताया है।

स्वास्थ्य व परिवार कल्याण संबंधी इस स्थायी समिति ने देश में चिकित्सा पेशे को बेहतर बनाने के लिए उत्कृष्ट अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से सहयोग करने और गुणवत्ता में सुधार के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी पीपीपी को बढ़ावा देने का सुझाव दिया है। चिकित्सा क्षेत्र में गुणवत्ता की बुनियाद सीधे-सीधे संसाधनों, पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण पर निर्भर है। इसलिए समिति ने इसके हरेक पाठ्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने पर जोर दिया है। जाहिर है, अगर इन सुझावों पर सरकार आगे बढ़ी तो पाठ्यक्रम निर्धारण, व्यावहारिक प्रशिक्षण और मूल्यांकन के मानकीकरण को सुनिश्चित करना होगा।

इसमें दो राय नहीं कि अब तक चिकित्सा संबंधी पढ़ाई और प्रशिक्षण के क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता का दावा कमोबेश सही रहा है। इसके बावजूद आज भी कई स्तरों पर कमियां दर्ज की जा रही हैं और अच्छा यह है कि उस पर गौर करके उसे दूर करने की कोशिश भी हो रही है। हालांकि यह देखने की बात होगी कि स्वास्थ्य क्षेत्र की समस्या के हल के लिए जो रास्ते अपनाए जा रहे हैं, उनका हासिल कैसी तस्वीर रचेगा। मसलन, समिति ने गुणवत्ता में बेहतरी के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर जोर दिया है।

सही है कि निजी भागीदारी से सेवा की गुणवत्ता को बेहतर करने का दावा किया जाता रहा है। लेकिन क्या यह मान लिया गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के तहत मुहैया कराई जाने वाली स्वास्थ्य सेवाएं निजी भागीदारी से ही बेहतर और गुणवत्ता से युक्त होंगी? यह किसी से छिपा नहीं है कि महानगरों से लेकर शहरों और कस्बों तक में निजी क्षेत्र की चिकित्सा-व्यवस्था की सुविधा का लाभ किन लोगों को और कितना मिल पाता है! इसके समांतर सार्वजनिक क्षेत्र के जो अस्पताल समाज के कमजोर तबकों की आम पहुंच में रहते हैं, जबकि निजी संचालन वाली चिकित्सा तक पहुंच एक खास तबके तक सिमट कर रह जाती है।

यह तथ्य है कि देश में आज भी चिकित्सकों की भारी कमी है। इसी तरह अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं से लेकर चिकित्सा के आधुनिक संसाधनों के मामले में भी स्थिति बेहतर नहीं है। देश के स्वास्थ्य ढांचे को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करने के लिए सरकार को हर संभव कदम उठाना चाहिए। लेकिन पीपीपी के विकल्प की ओर बढ़ने के बजाय खुद सरकार को अपने स्तर पर इस मोर्चे पर ठोस कदम क्यों नहीं उठाना चाहिए! आखिर देश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे अस्पताल चिकित्सा क्षेत्र में बेहतरीन गुणवत्ता के लिए ही जाने जाते हैं। विडंबना यह है कि देश के बजट में आज भी स्वास्थ्य क्षेत्र के मद में अपेक्षा से काफी कम राशि आबंटित की जाती है। इस लिहाज से देखें तो संसदीय समिति के सुझाव अहम हैं, लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि सार्वजनिक क्षेत्र के जो अस्पताल समाज के कमजोर तबकों के लिए सहारा रहे हैं, पीपीपी के बाद उनका स्वरूप कैसा रहेगा और अच्छी चिकित्सा तक कितने लोगों की पहुंच रहेगी!

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