पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश की राजनीति में लोगों के बीच नफरत फैलाने वाले बयानों या भड़काऊ भाषणों के जरिए सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिशें चिंता का कारण बनती रही हैं। ऐसे अनेक मौके सामने आए, जिनमें किसी नेता पर राजनीतिक स्वार्थ साधने या फायदा उठाने की मंशा से ऐसी बयानबाजियां करने या नारे लगाने के आरोप लगे, जिससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ने की आशंका पैदा हुई। मगर ऐसे नेताओं को जहां कानून के कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए था, वहां उनके प्रति पुलिस या शासन-तंत्र ने एक तरह से नरम रवैया अपनाया।
शायद इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर बढ़ते नफरती भाषणों की समस्या से निपटने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई थी। मगर इस मसले पर सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि वर्तमान कानून का ढांचा लोगों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या सार्वजनिक शांति को भंग करने वाली हरकतों से सक्षम तरीके से निपटता है। इसमें भारतीय दंड संहिता और अन्य संबंधित कानूनों के प्रावधान शामिल हैं।
जाहिर है, मौजूदा कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में अदालत ने एक तरह से स्थिति स्पष्ट कर दी है। मगर इससे इतर नफरती भाषणों के जरिए अगर लोगों के बीच विद्वेष फैलाने की कोशिश की जाती है, तो इसकी नए सिरे से व्याख्या करने और उसे कानूनी दायरे में लाने की जरूरत है। इस संदर्भ में अदालत ने स्पष्ट किया कि अपराध की व्याख्या या उसे परिभाषित करना और सजा तय करना पूरी तरह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में अदालत केवल सुधारों की जरूरत की ओर विधायिका और कार्यपालिका का ध्यान खींच सकती है।
अदालत की यह टिप्पणी अहम है कि नफरती भाषणों के संदर्भ में याचिकाकर्ताओं की शिकायत कानून के अभाव में नहीं, बल्कि उसके लागू होने में कमी से पैदा होती है। ऐसी शिकायतें आम रही हैं कि कानूनी प्रावधान होने के बावजूद कई मामलों में पुलिस या तो आरोपों की अनदेखी करती है या फिर कमजोर धाराओं के तहत मामला दर्ज करती है। नतीजतन, जिन गतिविधियों की वजह से आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए थी, उसके विरुद्ध कानून लाचार नजर आता है।
दरअसल, हाल के वर्षों में कुछ नेताओं ने न केवल लोगों की भावनाएं भड़काने वाले भाषण दिए, बल्कि इस बात का खयाल रखना भी जरूरी नहीं समझा कि इससे देश में अलग-अलग समुदायों के बीच सद्भाव को नुकसान पहुंच सकता है और विषम हालात भी पैदा हो सकते हैं। मगर ऐसे आपत्तिजनक भाषण देने वाले लोगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने को लेकर सरकारों के भीतर ईमानदार इच्छाशक्ति का अभाव दिखता रहा है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इस तरह की प्रवृत्ति की अनदेखी करने या सुविधाजनक तरीके से कुछ नेताओं के नफरती भाषणों के प्रति आंखें मूंद लेने का नुकसान आखिरकार आम जनता और देश को उठाना पड़ेगा।
शीर्ष अदालत ने भी इसी संदर्भ में कहा कि नफरती भाषण और अफवाह फैलाने से जुड़े मुद्दे सीधे तौर पर भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण से जुड़े हैं। कायदे से कुछ संवेदनशील स्थितियों के बावजूद अगर मौजूदा कानूनी प्रावधानों का दायरा सीमित है, तो यह केंद्र और राज्य सरकारों पर निर्भर है कि वे बदलते परिदृश्यों तथा चुनौतियों के मद्देनजर आगे किसी ठोस कानूनी उपाय की जरूरत पर विचार करें।
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नफरत फैलाने वाले भाषणों के खिलाफ याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सजा का निर्धारण पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। भड़काऊ बयानबाज़ी (हेट स्पीच) से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कोई भी निर्देश देने से इनकार कर दिया। SC ने कई जगहों पर धर्म संसदों में दिए गए हेट स्पीच के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
