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नुमाइंदगी के नियम

हरियाणा में पंचायत चुनाव के लिए जिस तरह न्यूनतम शैक्षिक योग्यता की शर्त जोड़ी गई थी, वैसा ही फैसला मनोहर लाल खट्टर सरकार ने अब नगर निकाय चुनावों की खातिर किया है.

Author नई दिल्ली | December 31, 2015 12:04 AM
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर। (फाइल फोटो)

हरियाणा में पंचायत चुनाव के लिए जिस तरह न्यूनतम शैक्षिक योग्यता की शर्त जोड़ी गई थी, वैसा ही फैसला मनोहर लाल खट्टर सरकार ने अब नगर निकाय चुनावों की खातिर किया है। हो सकता है देर-सबेर दूसरे राज्य भी हरियाणा के इस कदम से प्रेरित हों। पंचायत चुनाव अधिनियम में संशोधन कर राज्य सरकार ने उम्मीदवारों के लिए जो चार नई कसौटियां जोड़ी थीं, वही अब नगर निकाय चुनावों की बाबत भी तय की गई हैं। इनमें सबसे खास है शैक्षिक योग्यता की शर्त। सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए दसवीं पास होना अनिवार्य होगा, वहीं दलितों और महिलाओं के लिए आठवीं पास की शर्त होगी। दूसरी कसौटी यह है कि उम्मीदवार कोआपरेटिव बैंक का डिफाल्टर न हो, न ही उस पर बिजली का बिल बकाया हो। तीसरी कसौटी के मुताबिक उम्मीदवार के घर में उपयोग लायक स्थिति में शौचालय होना जरूरी है। चौथा मापदंड यह है कि उम्मीदवार के खिलाफ संगीन आपराधिक मामले में किसी भी अदालत में आरोपपत्र दायर न हुआ हो। अभी तक पंचायत या नगर निकाय चुनाव लड़ने पर बंदिश केवल उन लोगों के लिए थी, जिन्हें सजा सुनाई जा चुकी हो। पर अब हरियाणा सरकार ने उन लोगों को भी उम्मीदवारी से बाहर कर दिया है जिनके खिलाफ अदालत में आरोप तय हो चुका हो। अलबत्ता यह बात उन्हीं मामलों में लागू होगी जिनमें कम से कम दस साल की सजा संभावित हो। पंचायत चुनाव में ये शर्तें जोड़ने के लिए राज्य सरकार ने विधानसभा से विधेयक पारित कराया था। पर नगर निकाय चुनावों में उम्मीदवारों के लिए नए मापदंडों का निर्धारण अभी सिर्फ मंत्रिमंडल का फैसला है। हो सकता है राज्य सरकार जल्दी ही इस संबंध में अध्यादेश जारी कर दे और उसकी जगह विधेयक लाने की औपचारिकता बाद में पूरी की जाए।

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दरअसल, खट्टर सरकार अब इस मामले में वैधानिक रूप से आश्वस्त नजर आती है, तो इसकेपीछे बीस दिन पहले आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। राज्य के पंचायती राज अधिनियम, 2015 को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई थी। पर अदालत ने संशोधनों को यानी उम्मीदवारी की नई शर्तों को सही ठहराया। सबसे ज्यादा एतराज शैक्षिक योग्यता संबंधी कसौटी पर थे। दलील दी गई कि जब लोकसभा और विधानसभा में जहां प्रतिनिधि के शिक्षित होने की अधिक जरूरत है, शिक्षा की कसौटी लागू नहीं है, तो निहायत स्थानीय स्तर पर ऐसा क्यों? यह तर्क भी दिया गया कि औपचारिक शिक्षा और समाज-सेवा की भावना एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं। पर सर्वोच्च अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। पहले पंचायत और अब नगर निकाय चुनावों के लिए हरियाणा में किए गए नए प्रावधानों से ये संस्थाएं अधिक कुशल और सक्षम हो सकेंगी। उनके कंप्यूटरीकरण का भी रास्ता खुल सकता है। परिवार के किसी भी सदस्य को उम्मीदवार बना देने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। यह किसी से छिपा नहीं है कि अदालतों में मामले बरसों-बरस घिसटते रहते हैं। इसका फायदा उठा कर बहुत-से वैसे लोग भी उम्मीदवार बन जाते हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे होते हैं। संगीन मामलों में अदालत में आरोप तय होते ही उम्मीदवारी के अयोग्य ठहराने का सुझाव निर्वाचन का आयोग का रहा है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों केसंदर्भ में तो वह नहीं हो सका, पर पंचायत और नगर निकाय चुनावों में उसे लागू कर हरियाणा ने एक मिसाल पेश की है।

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