किसी भी आपराधिक वारदात में पीड़ित को न्यायपालिका पर भरोसा होता है कि उसे न्याय जरूर मिलेगा। मगर इंसाफ तभी मिल पाता है, जब मामले की गंभीरता के मद्देनजर जांच-पड़ताल की जाए और अदालत में पुख्ता साक्ष्य प्रस्तुत किए जाएं। यह काम जांच एजंसियों का होता है, लेकिन कई बार ऐसा देखा गया है कि पुलिस या अन्य जांच एजंसियों के अधिकारी संगीन मामलों को भी गंभीरता से नहीं लेते हैं और हल्की धाराओं के तहत मामला दर्ज करते हैं। इसके पीछे या तो जांच अधिकारियों की लापरवाही होती है या फिर किसी बाहरी दबाव की वजह से मामले को कमजोर करने की मंशा छिपी होती है।

हरियाणा के गुरुग्राम में पिछले माह एक मासूम बच्ची के यौन उत्पीड़न के मामले में भी पुलिस का ऐसा ही रवैया सामने आया है। इस पर सर्वाेच्च न्यायालय ने बुधवार को कड़ा संज्ञान लेते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक विशेष जांच दल गठित करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस मामले में पुलिस का रवैया शर्मनाक और असंवेदनशील रहा है, जो न्यायिक प्रक्रिया के लिए चिंताजनक है।

यह बात छिपी नहीं है कि सामान्य आपराधिक घटना में भी प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए पीड़ित पक्ष को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि कानून में अब शून्य पुलिस प्राथमिकी दर्ज कराने का प्रावधान है, इसके बावजूद अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि घटनास्थल का किसी दूसरे थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने का हवाला देकर पुलिसकर्मी प्राथमिकी दर्ज करन से इनकार कर देते हैं। कई बार तो पुलिस के साथ जांच प्रक्रिया से जुड़े अन्य संस्थाओं के पदाधिकारियों का गठजोड़ भी सामने आता है। गुरुग्राम मामले में भी इस तरह की बातें सामने आई हैं।

पुलिस ने पाक्सो (यौन अपराध से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी में गंभीर धारा लगाने की बजाय हल्की धारा लगाकर अपराध को कमतर दिखाने की कोशिश की। सर्वाेच्च न्यायालय ने बच्ची के बयान पर अपना पक्ष पूरी तरह से बदलने के लिए एक निजी अस्पताल की चिकित्सक को भी फटकार लगाई और कहा कि उनका यह व्यवहार शर्मनाक है।

इसमें दोराय नहीं कि किसी भी अपराध में पीड़ित को इंसाफ दिलाने की जिम्मेदारी पुलिस और दूसरी संबंधित जांच एजंसी की होती है। मगर राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रपट पर गौर करें, तो वर्ष 2018 से 2022 के दौरान बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि की दर 27-28 फीसद के बीच दर्ज की गई थी। वर्ष 2023 में यह दर घटकर 23 फीसद से भी कम रह गई। यानी बलात्कार के मामलों में कड़े कानूनी प्रावधानों का असर आरोपियों को सजा दिलाने में नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे मामलों की जांच में देरी, सबूतों का अभाव या गवाहों के मुकर जाने जैसे कई कारण हो सकते हैं, मगर इसके लिए सीधे तौर पर जवाबदेही पुलिस की ही बनती है।

शीर्ष अदालत ने गुरुग्राम मामले में स्थानीय बाल कल्याण समिति के सदस्यों की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि क्यों न उन्हें पद से हटा दिया जाए। अदालत ने पुलिस के साथ-साथ समिति के आचरण को भी कठघरे में खड़ा किया। बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी और पीड़ित बच्ची एवं उसके परिवार को जल्द इंसाफ मिलेगा।