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नाम के पीछे

प्राचीन साक्ष्य है कि गुड़गांव का नाम गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर पड़ा था, जिसे तब गुरुग्राम कहा जाता था।

Author नई दिल्ली | April 14, 2016 2:31 AM
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि गुड़गांव का नाम बदलकर गुरु ग्राम रखा जाएगा।

हरियाणा सरकार ने आखिर गुड़गांव का नाम बदल कर गुरुग्राम और मेवात का नूंह करने को हरी झंडी दे दी। हालांकि यह प्रस्ताव काफी समय से था, पर किन्हीं अड़चनों के चलते इस पर फैसला नहीं लिया जा पा रहा था। यह पहली बार नहीं है, जब किसी जिले या शहर के नाम को उसके प्राचीन साक्ष्यों के आधार पर संशोधित किया गया है। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई आदि नाम भी दुरुस्त किए गए। इसलिए हरियाणा सरकार के ताजा फैसले के बाद तमाम दस्तावेजों में पुराने नामों को बदलने संबंधी अड़चनों का तर्क बहुत दमदार नहीं कहा जा सकता। थोड़े समय बाद नए नाम लोगों की जुबान पर चढ़ जाएंगे और धीरे-धीरे व्यवहार में शामिल हो जाएंगे। पर सवाल है कि इन शहरों के अब तक चले आ रहे नाम ही बने रहते तो क्या हर्ज था।

और यह भी कि प्राचीन साक्ष्यों के आधार पर इनके नाम में सुधार कर देने से क्या हासिल होगा। प्राचीन साक्ष्य है कि गुड़गांव का नाम गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर पड़ा था, जिसे तब गुरुग्राम कहा जाता था। राज्य सरकार का तर्क है कि इसके प्राचीन नाम को चलन में लाने से इसकी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में मदद मिलेगी। मगर हकीकत यह भी है कि जिस तरह शहरों, सड़कों, स्थानों, संस्थाओं वगैरह के नाम धीरे-धीरे लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं, उसी तरह उनके पीछे का सांस्कृतिक मकसद भी विस्मृत हो जाता है। केवल नाम बदल देने से गुड़गांव और मेवात की प्राचीन सांस्कृतिक गरिमा लौट पाएगी, दावा करना मुश्किल है।

भाषा वैज्ञानिक तथ्य है कि शब्दों के उच्चारण लोग अपने बोलने की सुविधा के मुताबिक बदल लेते हैं। इस तरह कई बार बहुत सारे शब्द घिसते-घिसते अलग स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। गुरुग्राम के साथ भी यही हुआ होगा। आखिर ग्राम को गांव बोलने-लिखने पर किसे एतराज होता है! बल्कि लोगों को यह ज्यादा सहज लगता है। गुरु को गुर भी लोग बोलते ही हैं। र का उच्चारण बहुत बार सहज ही ड़ में बदल जाता है। अगर गुड़गांव की प्राचीन पहचान की इतनी ही चिंता थी तो जिला बनाते समय ही इसके नाम में संशोधन कर दिया गया होता, तब शायद अंगुली उठने की गुंजाइश नहीं रहती। गुड़गांव अब हरियाणा का सबसे उन्नत और अंतरराष्ट्रीय बाजार में समृद्ध पहचान वाला शहर बन चुका है। वहां अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर हैं, अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य के केंद्र हैं। इन सबके चलते वहां एक अलग तरह की संस्कृति विकसित हो चली है। इसलिए इसके नाम में बदलाव से कंपनियों को कुछ तकनीकी दिक्कतें जरूर पेश आ सकती हैं, उनका सांस्कृतिक रुझान शायद ही बदले।

दरअसल, सरकारों के शहरों, सड़कों, संस्थानों आदि के नाम बदलने के पीछे उनका वैचारिक आग्रह ज्यादा देखा जाता है। ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं, जब किसी सरकार ने पिछली सरकार के समय चलाई गई योजनाओं-परियोजनाओं के नाम बदल कर अपने विचारों-सिद्धांतों के आधार पर कर दिए। उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के समय शहरों, जिलों, जगहों आदि के नाम बदलने के पीछे भी यही आग्रह था। हरियाणा की मनोहरलाल खट््टर सरकार के वैचारिक आग्रह छिपे नहीं हैं। हालांकि बहुत पुराना जुमला है कि नाम में क्या रखा है। पर सवाल है कि महज अपने वैचारिक आग्रह के चलते किसी शहर, स्थान या संस्था का नाम बदल देना और इसके चलते व्यवस्था पर करोड़ों रुपए का बोझ डाल देना कहां तक उचित है।

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