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आंदोलन की मर्यादा

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध जताने या आंदोलन करने का हक सभी को हासिल है। लेकिन अपनी मांग उठाने का तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए जो दूसरों को संकट में डाल दे। गुर्जर समुदाय के आंदोलन के मद्देनजर राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश ने इसी तकाजे की ओर ध्यान दिलाया है।

Author May 29, 2015 5:23 PM
सरकार से बातचीत के बाद पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग को लेकर आठ दिन से राजस्थान में जारी गुर्जर आन्दोलन आज समाप्त हो गया। (फोटो: भाषा)

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध जताने या आंदोलन करने का हक सभी को हासिल है। लेकिन अपनी मांग उठाने का तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए जो दूसरों को संकट में डाल दे। गुर्जर समुदाय के आंदोलन के मद्देनजर राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश ने इसी तकाजे की ओर ध्यान दिलाया है।

यों इस आदेश का तात्कालिक संदर्भ गुर्जर समुदाय के आंदोलन के तौर-तरीकों से संबंधित है, मगर इसका व्यापक महत्त्व औरों के लिए भी है। नौ दिन पहले राजस्थान में शुरू हुए इस आंदोलन के चलते लोगों खासकर मुसाफिरों को भारी असुविधा हो रही थी।

आंदोलनकारियों ने डेरा डाल कर दिल्ली-मुंबई रेलमार्ग को जाम कर दिया। उन्होंने राजमार्गों को भी नहीं बख्शा। पटरियों पर धरने के कारण डेढ़ सौ से ज्यादा ट्रेनें रद्द हुर्इं और सौ से ज्यादा ट्रेनों के मार्ग परिवर्तित किए गए। जिन लोगों की ट्रेनें रद्द हुई होंगी उनकी परेशानियों की कल्पना की जा सकती है। रेलवे को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ। लोगों को हुई निजी क्षति का ठीक आकलन शायद ही हो पाए। यह बेहद अफसोस की बात है कि राज्य का पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। ऐसे मौकों पर अधिकारी खुद कोई कदम उठाने के बजाय ऊपर से निर्देश मिलने का इंतजार करते हैं। राज्य सरकार पटरियों और राजमार्गों को खाली कराने का आदेश देने से क्यों हिचकती रही?

कोई सात साल पहले आरक्षण की मांग को लेकर गुर्जर समुदाय ने इससे भी उग्र आंदोलन किया था। तब भी उच्च न्यायालय ने ऐसे ही निर्देश राज्य प्रशासन को दिए थे। गुरुवार को एक बार फिर न्यायालय ने राजस्थान के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को फटकार लगाते हुए कहा कि वे रेल पटरियों और सड़कों से अवरोध फौरन हटाएं।

अदालत ने यह भी कहा है कि वे इस बीच हुए नुकसान का हिसाब पेश करें। अदालत के निर्देश से यातायात बहाल होने का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन गुर्जर आरक्षण की गुत्थी शायद बनी रहेगी। गुर्जरों की मांग है कि उन्हें पांच फीसद विशेष आरक्षण दिया जाए। वे यह भी चाहते हैं कि उन्हें पिछड़े वर्ग से हटा कर अनुसूचित जनजाति के वर्ग में रखा जाए। जब राजस्थान में जाटों को ओबीसी आरक्षण का हकदार बनाया गया, तभी से गुर्जर समुदाय को लगने लगा कि इस वर्ग में प्रतिस्पर्धा उनके लिए कठिन हो गई है।

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लिहाजा, उन्होंने अनुसूचित जनजाति के दायरे में शामिल किए जाने की मांग शुरू की। मगर मीणा समुदाय इसके विरोध में खड़ा हो गया, जो आदिवासी आरक्षण का भरपूर लाभ उठाता आ रहा है। ऐसी सूरत में गुर्जर समुदाय को पांच फीसद के विशेष आरक्षण का भरोसा दिला कर उसे शांत करने की कोशिश की गई। मगर यह आश्वासन अमल में नहीं आ सका।

सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की पचास फीसद की सीमा तय कर रखी है। बहरहाल, इस प्रसंग से आरक्षण को लेकर चलने वाला सियासी खेल एक बार फिर उजागर हुआ है। एक तरफ हमारे राजनीतिक वोट के चक्कर में आरक्षण की नई-नई मांग को हवा देते रहते हैं, और दूसरी तरफ, विभिन्न जातियों के संगठन भी चुनाव में समर्थन की बात कह कर आरक्षण की मनमाफिक मांग उठाते रहते हैं। फिर, समस्या आरक्षित वर्ग के भीतर उपज रहे असंतोष की भी है, क्योंकि आरक्षण का लाभ संबंधित आरक्षण-सूची में शामिल समुदायों को समान रूप से नहीं मिल पा रहा है।

यह स्थिति पिछड़े वर्ग में भी है और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग में भी। इस समस्या को सुलझाना और आरक्षण को अधिक तर्कसंगत बनाना एक कठिन चुनौती है। पर अदालत के आदेश का सबक साफ है कि आरक्षण के बेतुके आश्वासन देने की राजनीति बंद हो। दूसरा, आंदोलन का तरीका अन्य लोगों के लिए मुसीबत खड़ी करने और भयादोहन का नहीं हो सकता।

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