ताज़ा खबर
 

तेल की धार

गुजरात में वैट दरें घटने से पेट्रोल की कीमत दो रुपए तिरानबे पैसे और डीजल की दो रुपए बहत्तर पैसे कम हो जाएगी। वहां सरकार पहले पेट्रोल और डीजल पर चौबीस फीसद वैट और चार प्रतिशत उपकर वसूल रही थी।
Author October 12, 2017 05:34 am
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई तरह के टैक्स जुड़े होते हैं।

डीजल और पेट्रोल की कीमतों में अतार्किक बढ़ोतरी पर चौतरफा विरोध के बीच गुजरात सरकार ने दिवाली की सौगात के तौर पर मूल्यवर्द्धित कर यानी वैट में चार प्रतिशत की कटौती कर दी है। निश्चय ही इस फैसले से लोगों को कुछ राहत महसूस होगी। गुजरात की तर्ज पर हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार ने भी वैट दरों में कटौती का फैसला किया है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव नजदीक हैं, इसलिए विपक्षी दल स्वाभाविक रूप से इस फैसले को चुनाव से जोड़ कर देख रहे हैं। गुजरात में वैट दरें घटने से पेट्रोल की कीमत दो रुपए तिरानबे पैसे और डीजल की दो रुपए बहत्तर पैसे कम हो जाएगी। वहां सरकार पहले पेट्रोल और डीजल पर चौबीस फीसद वैट और चार प्रतिशत उपकर वसूल रही थी। हालांकि गुजरात सरकार का कहना है कि यह फैसला चुनाव के मद्देनजर नहीं किया गया है, पर सामान्यतया लोग इसे चुनावी कदम ही मान रहे हैं। इस फैसले से भाजपा को गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में कितना फायदा मिलेगा, देखने की बात है।

इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत अब तक के सबसे निचले स्तर पर है, पर भारतीय बाजार में पेट्रोल और डीजल का दाम उस समय से भी अधिक है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सबसे ऊंचे स्तर पर थी। इसलिए लगातार सवाल उठते रहे हैं कि डीजल और पेट्रोल की कीमतें तय करने के मामले में पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जाती। राज्य सरकारों के तेल पर मनमाना कर वसूलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के व्यावहारिक उपाय क्यों नहीं किए जाते। हो सकता है कि गुजरात, हिमाचल और महाराष्ट्र से नजीर लेते हुए कुछ और भाजपा शासित राज्यों में सरकारें वैट में कटौती का फैसला करें, पर उससे तेल पर करों के निर्धारण में तार्किक कदम न उठाए जाने का सवाल खत्म नहीं हो जाएगा।

छिपी बात नहीं है कि डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़ने का असर माल ढुलाई, सार्वजनिक परिवहन, वस्तुओं के उत्पादन आदि पर पड़ता है। यानी इसका सीधा बोझ न सिर्फ उन लोगों पर पड़ता है जो गाड़ियां चलाते हैं, बल्कि सामान्य लोगों पर भी पड़ता है। मगर कुछ दिनों पहले एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि गाड़ियां चलाने वाले लोग कोई भूखों मरने वाले नहीं हैं, जो डीजल और पेट्रोल की कीमत न चुका सकें! सरकार महंगाई से पार पाने की जद्दोजहद कर रही है। अर्थव्यवस्था की चाल सुस्त पड़ गई है। किसान और कारोबारी सबमें एक प्रकार के असंतोष का भाव है।

ऐसे में डीजल और पेट्रोल की कीमतें घटाने को लेकर कोई व्यावहारिक उपाय निकालने के बजाय सिर्फ उन राज्यों में राहत देने के नाम पर करों में मामूली कटौती कर राहत पहुंचाने का प्रयास करना, जहां विधानसभा चुनाव होने हैं, इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। पेट्रोल और डीजल पर राज्य सरकारों की तरफ से लगाए जाने वाले मनमाना करों पर रोक लगाने के लिए कोई व्यावहारिक नीति बननी चाहिए। इसके अलावा केंद्र को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर किन वजहों के चलते वह तेल की कीमतों को संतुलित नहीं कर पा रही। वैसे ही लोगों पर इतने तरह के करों और उपकरों का बोझ है, तेल की कीमतें बेलगाम छोड़ कर रोजमर्रा के खर्च बढ़ाने से सरकार को और असंतोष का सामना करना पड़ेगा। इसलिए इस मामले में मामूली कटौतियों का सहारा लेने के बजाय व्यावहारिक कदम उठाने की जरूरत है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.