ताज़ा खबर
 

जीएसटी की राह

विकास दर ऊंची रखने के अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सरकार कर सुधार की प्रक्रिया में तेजी लाना चाहती है। यही वजह है कि मानसून सत्र में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संबंधी विधेयक के पारित न होने की वजह से उसने संसद का विस्तारित सत्र बुलाने की योजना बनाई थी...

Author Published on: September 12, 2015 9:32 AM

विकास दर ऊंची रखने के अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सरकार कर सुधार की प्रक्रिया में तेजी लाना चाहती है। यही वजह है कि मानसून सत्र में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संबंधी विधेयक के पारित न होने की वजह से उसने संसद का विस्तारित सत्र बुलाने की योजना बनाई थी। मगर बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित हो जाने के बाद उसे टालना पड़ा। अब वह चाहती है कि संसद का शीतकालीन सत्र समय से पहले बुलाया जाए। दरअसल, जीएसटी लागू करने को लेकर सरकार इसलिए भी जल्दबाजी में है कि इससे औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने और वस्तुओं की कीमतें नियंत्रित करने में काफी हद तक मदद मिलेगी।

विकास दर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अभी केंद्र और राज्यों में वस्तुओं और सेवाओं पर लगने वाले करों की दरें अलग-अलग हैं। इस तरह कच्चे माल से लेकर तैयार माल तक की उत्पादन लागत काफी बढ़ जाती है। केंद्रीय कर तय हो जाने के बाद औद्योगिक इकाइयों को अलग-अलग करों के भुगतान से मुक्ति मिलेगी। मगर राज्य सरकारों को एतराज रहा है कि इस तरह उन्हें राजस्व में नुकसान उठाना पड़ेगा। पर केंद्र ने काफी हद तक उनकी इस आशंका का निवारण कर दिया है। जीएसटी की वजह से राज्यों को होने वाले राजस्व घाटे की तीन साल तक भरपाई केंद्र करेगा। अब ज्यादातर भाजपा शासित राज्य जीएसटी के पक्ष में नजर आने लगे हैं।

पर इसमें कुछ तकनीकी अड़चनें अब भी बनी हुई हैं, जिसे लेकर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं। इसलिए सरकार भले जीएसटी को अगले वित्तवर्ष से लागू करने की तैयारी में हो, पर इन तकनीकी खामियों के रहते शीत सत्र में भी इसे मंजूरी मिल पाएगी, कहना मुश्किल है। दरअसल, जीएसटी को लेकर विरोध का सबसे बड़ा कारण इसमें राज्यों के लिए एक प्रतिशत अंतरराज्यीय आवागमन कर वसूली का प्रावधान है। यूपीए सरकार के समय जब जीएसटी पर राज्य सरकारों की मंजूरी का प्रयास किया जा रहा था, गुजरात ने मांग की थी कि वस्तुओं और सेवाओं के अंतरराज्यीय आवागमन पर राज्यों को दो प्रतिशत अतिरिक्त कर वसूलने का अधिकार मिलना चाहिए, ताकि उन्हें राजस्व का घाटा न उठाना पड़े।

अब नरेंद्र मोदी सरकार ने उस मांग को मानते हुए अंतरराज्यीय कर के रूप में एक प्रतिशत का प्रावधान किया है। यह समझना मुश्किल है कि जब केंद्र सरकार राज्यों के राजस्व घाटे की भरपाई करेगी, तो फिर अलग से अंतरराज्यीय आवागमन कर का प्रावधान क्यों होना चाहिए। इस प्रावधान के चलते वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें संतुलित कर पाने का मकसद पूरा नहीं हो पाएगा। छिपी बात नहीं है कि कंपनियों को किसी उत्पाद को तैयार करने की प्रक्रिया में कच्चे माल को उसके विभिन्न चरणों में प्रसंस्करण, पैकिंग आदि के लिए अपनी ही अलग-अलग इकाइयों में भेजना-लाना पड़ता है।

ये इकाइयां कई बार अलग-अलग राज्यों में होती हैं। इस तरह एक ही कंपनी को कोई उत्पाद तैयार करने के क्रम में कई बार अंतरराज्यीय आवागमन कर का भुगतान करना पड़ेगा। जीएसटी लागू होने से औद्योगिक इकाइयों और अंतत: उपभोक्ता को मिलने वाले लाभ से इनकार नहीं किया जा सकता, पर इस विधेयक में अगर कुछ खामियां रह गई हैं, तो उन्हें सर्वसम्मति से दूर करने में सरकार को क्यों गुरेज होना चाहिए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories