पश्चिम एशिया में संघर्ष से उपजे बहुस्तरीय वैश्विक संकट के बीच देश के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में खासी बढ़ोतरी अर्थव्यवस्था की गति को बनाए रखने के लिए निश्चित रूप से संबल प्रदान करेगी। इससे सरकारी कोष को मजबूती मिलेगी और विकास से जुड़ी नीतियों के निर्माण में भी आसानी होगी। जब सरकार के पास पर्याप्त पूंजी का प्रावधान होता है, तो नागरिकों के लिए मूलभूत सुविधाओं के सृजन या विस्तार की योजनाओं को जमीन पर उतारने में आर्थिक बाधाएं खत्म हो जाती हैं। जीएसटी संग्रह में 8.7 फीसद की वृद्धि दर्शाती है कि उपभोक्ता बाजार में उत्साह बना हुआ है और लोग सामान एवं सेवाओं पर खर्च कर रहे हैं। सरकार के स्तर पर इस बढ़ोतरी को पिछले वर्ष लागू किए गए जीएसटी सुधारों से जोड़कर देखा जा रहा है। मगर इसका एक पहलू यह भी है कि इन सुधारों से व्यापारी वर्ग से लेकर आम आदमी को एक तरफ राहत जरूर मिली है, लेकिन दूसरी तरफ उनकी मुश्किलें बढ़ी हैं।
सरकार की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, बीते अप्रैल में देश का जीएसटी संग्रह बढ़कर 2.43 लाख करोड़ रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। इससे पहले जीएसटी का सर्वकालिक उच्च संग्रह अप्रैल, 2025 में 2.23 लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा था। इस बार घरेलू लेन-देन से सकल राजस्व 4.3 फीसद बढ़कर 1.85 लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा, जबकि आयात से जीएसटी संग्रह 25.8 फीसद की वृद्धि के साथ 57,580 करोड़ रुपए पर पहुंच गया। इससे स्पष्ट है कि आयात से जुड़ी गतिविधियों में इजाफा हुआ है, जो वैश्विक अस्थिरता के बीच राजस्व प्राप्त करने के स्तर पर तो उत्साहजनक हो सकता है, लेकिन आत्मनिर्भरता के मोर्चे पर यह देश के कमजोर पक्ष को दर्शाता है।
इसके साथ ही घरेलू लेन-देन और आयात आधारित राजस्व के बीच बढ़ा अंतर नीतिगत पुनर्मूल्यांकन की जरूरत की ओर इशारा करता है। ऐसे में जरूरी है कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को वैश्विक आपूर्ति शृंखला में बदलावों के अनुरूप मजबूत करने के व्यापक स्तर पर प्रयास किए जाएं।
घरेलू लेन-देन के मोर्चे पर राजस्व संग्रह की बात की जाए, तो सितंबर 2025 से लागू हुए जीएसटी सुधारों के तहत करीब 375 वस्तुओं पर कर दरें कम की गई थीं और चार श्रेणियों को मिलाकर पांच एवं अठारह फीसद की दो श्रेणियां रखी गई थीं। सरकार का दावा है कि इन सुधारों का मकसद वस्तुओं की कीमतों में कमी लाना, खपत बढ़ाना और बाजार में मांग को विस्तार देना है।
मगर सरकार के इस कदम से वस्तुओं की कीमतें कम होती नजर नहीं आ रही हैं और छोटे कारोबारी भी इसे राहत कम और परेशानी ज्यादा मान रहे हैं। इस परेशानी का मूल कारण कच्चे माल एवं सेवाओं तथा तैयार माल की कर दरों के बीच का भारी अंतर है। यानी कई तरह के कच्चे माल को जीएसटी की अठारह फीसद की श्रेणी में रखा गया है, जबकि उससे तैयार माल पर पांच फीसद कर निर्धारित है।
हालांकि, अतिरिक्त कर को सरकार से वापस लेने का प्रावधान है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लंबी और जटिल कागजी कार्रवाई के कारण इसमें महीनों लग जाते हैं। इसका असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ता है। यह सही है कि राजस्व अर्जित करने के स्रोत में कर प्रणाली का महत्त्वपूर्ण योगदान है, लेकिन यह देखना भी सरकार का काम है कि समाज के निचले एवं मध्य वर्ग पर कर का अतिरिक्त बोझ न पड़े।
