लोकतंत्र में चुनाव की शुचिता बनाए रखने के लिए मतदाता सूची में समय-समय पर संशोधन जरूरी है। इसी मकसद से देश के विभिन्न राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई है। मगर इसमें कई तरह की बाधाएं भी उत्पन्न हो रही हैं। कभी बड़ी संख्या में नागरिकों को मसविदा सूची से बाहर करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो कभी सियासी दलों की ओर से इस प्रक्रिया में नियमों के विपरीत दखल देने के आरोप लग रहे हैं।

ऐसे में सबसे जरूरी है कि नई मतदाता सूची तैयार करने में पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता बरती जाए, ताकि सभी पात्र नागरिकों का मताधिकार सुरक्षित रह सके और अपात्र या मृतकों के नाम सूची से हटाने का कार्य बिना किसी विवाद या बाधा के पूरा हो सके। यही वजह है कि सर्वाेच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल से जुड़े ऐसे ही एक मामले में सोमवार को सभी राज्यों को स्पष्ट कर दिया कि विशेष गहन पुनरीक्षण की कवायद में किसी को भी बाधा डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

साथ ही इस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने और विभिन्न आशंकाओं का निराकरण करने के निर्देश भी जारी किए हैं।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत बिहार से हुई थी और तब से लेकर यह प्रक्रिया विवादों में है। शुरू में चुनाव आयोग की ओर से आधार कार्ड को पहचान पत्र के दस्तावेज में शामिल न करने का मुद्दा प्रमुखता से उठा था। आयोग का तर्क था कि आधार को नागरिकता का पहचान पत्र नहीं माना जा सकता, मगर बाद में सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देश पर इसे पहचान के दस्तावेज में शामिल कर लिया गया।

अब पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया पर आए दिन नए-नए सवाल उठ रहे हैं। पिछले दिनों चुनाव आयोग ने खुद राज्य में मसविदा सूची में छूट गए मतदाताओं की सुनवाई की प्रक्रिया रोकने का निर्देश दिया था। आयोग ने माना था कि वर्ष 2002 की मतदाता सूची के डिजिटलीकरण में तकनीकी समस्या की वजह से कई लोगों के नाम मसविदा सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं और ऐसे लोगों के लिए फिलहाल व्यक्तिगत सुनवाई की जरूरत नहीं है।

मगर यह बात भी उतनी ही अहम है कि आयोग की इस कवायद में किसी राज्य सरकार का सीधे तौर पर दबाव या दखल देना उचित नहीं हो सकता।

इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को सफल तरीके से पूरा करने की जिम्मेदारी सिर्फ चुनाव आयोग की नहीं है, बल्कि राज्य सरकारों की भी इसमें अहम भूमिका है। इसके लिए पर्याप्त और सक्षम कर्मी उपलब्ध कराने का जिम्मा राज्य सरकार का होता है।

ऐसे में अपेक्षा की जाती है कि इसमें सियासत को दूर रखकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग सहयोग एवं समन्वय के साथ काम करेंगे। चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में कुछ और कर्मियों को पुनरीक्षण प्रक्रिया में तैनात करने की मांग करता रहा है, जिस पर राज्य सरकार अब जाकर राजी हुई है।

अगर सरकार इस पर पहले ही हामी भर देती, तो इस कार्य में लगे अन्य कर्मियों को भी काम का दबाव नहीं झेलना पड़ता, जिसको लेकर राज्य में सत्तारूढ़ दल की ओर से ही सवाल उठाए जाते रहे हैं।

चुनाव आयोग की भी यह प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए कि कोई भी पात्र व्यक्ति मतदान के अधिकार से वंचित न हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता एवं निष्पक्षता बनी रहे।