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ग्रीनपीस इंडिया: आलोचना का जोखिम

वित्तीय प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन करने और देश के ‘आर्थिक हितों के खिलाफ’ काम करने की बिना पर केंद्र सरकार ने स्वयंसेवी संगठन ग्रीनपीस इंडिया के विदेश से चंदा हासिल करने के लाइसेंस पर छह महीने के लिए रोक लगा दी है। साथ ही संकेत दिया है कि यह रोक स्थायी भी हो सकती है। […]

वित्तीय प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन करने और देश के ‘आर्थिक हितों के खिलाफ’ काम करने की बिना पर केंद्र सरकार ने स्वयंसेवी संगठन ग्रीनपीस इंडिया के विदेश से चंदा हासिल करने के लाइसेंस पर छह महीने के लिए रोक लगा दी है। साथ ही संकेत दिया है कि यह रोक स्थायी भी हो सकती है। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक देश में विभिन्न श्रेणियों के लाखों स्वयंसेवी संगठन हैं।

उनमें ग्रीनपीस अकेला नहीं है जिसे विदेशी चंदा मिलता रहा है। कुछ ऐसे भी हैं जो सरकारी अनुदान से काम करते हैं। ऐसे कितने संगठनों के वित्तीय रिकार्ड की बारीकी से जांच कराई गई और कितनों के बारे में खुफिया रिपोर्ट मांगी गई? कोई स्वयंसेवी संगठन तभी क्यों कठघरे में खड़ा किया जाता है जब उसकी सक्रियता सरकार को रास नहीं आती?

विदेशी अनुदान नियमन अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोप का जवाब ग्रीनपीस इंडिया को देना है। पर यह गौरतलब है कि वह पहले से सरकार के निशाने पर रहा है। उसकी वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई को सरकार ने लंदन जाने से रोक दिया था, क्योंकि वे मध्यप्रदेश की एक खनन परियोजना से स्थानीय लोगों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के बारे में कुछ ब्रिटिश सांसदों को अवगत कराने जा रही थीं।

केंद्र सरकार की यह कार्रवाई नागरिक अधिकार का हनन करने वाली थी, जो इस बारे में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से भी जाहिर है। अनेक स्वयंसेवी संगठन पर्यावरण और मानवाधिकार से जुड़े मसलों पर काम करते हैं। लिहाजा, प्रशासन और सरकारी नीतियों की आलोचना भी स्वाभाविक रूप से उनके काम का हिस्सा बन जाती है। इसे देश के आर्थिक हितों के खिलाफ कहना निहायत बेतुका आरोप है।

कुडनकुलम के परमाणु संयंत्र के विरोध को कुचलने के लिए इसी तरह के आरोप यूपीए सरकार के समय भी लगाए गए थे। विडंबना यह है कि जब ऐसा ही विरोध कोई राजनीतिक दल करता है तो उसे राष्ट्र-विरोधी नहीं कहा जाता। जैतापुर की परमाणु परियोजना का विरोध भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना भी करती आई है।

पश्चिम बंगाल में कोई भी परमाणु बिजलीघर न बनने देने का प्रस्ताव खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की विधानसभा में पारित कराया था। पर न उद्धव ठाकरे की मंशा पर अंगुली उठाई गई न ममता बनर्जी की। सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन अगर किसी स्वयंसेवी संगठन ने चलाया होता, तो उस पर न जाने कितनी तोहमत मढ़ी जाती, उसे विकास का रोड़ा और देश के खिलाफ काम करने वाला कहा गया होता।

आखिर अविश्वास सिर्फ स्वयंसेवी संगठनों पर क्यों किया जाता है? पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने न्यायपालिका को पांचसितारा कार्यकर्ताओं के प्रभाव में न आने की नसीहत दी। क्या पर्यावरण संरक्षण और मानवाधिकार से जुड़े मुद््दों पर जनहित याचिकाओं के जरिए लड़ना गुनाह है?

सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे कई मामलों का स्वत: संज्ञान लिया है। जिन नीतियों और फैसलों का विरोध सरकारों को नागवार गुजरता है, संभव है कल उन्हें बदलने की जरूरत ज्यादा बड़े पैमाने पर महसूस की जाए। बड़े बांधों का आकर्षण अब वैसा नहीं है जैसा कुछ दशक पहले था। फुकुशिमा के हादसे के बाद दुनिया भर में एटमी बिजलीघरों को लेकर अंदेशे बढ़े हैं। इस तरह के और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। असहमति, आलोचना और विरोध केवल राजनीतिक दलों का विशेषाधिकार नहीं है।

 

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