उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में पानी में डूब कर एक युवा इंजीनियर की मौत के मामले में अधिकारियों की कार्यशैली पर उठे सवालों के बीच विशेष जांच दल (एसआइटी) ने सरकार को अपनी रपट सौंप दी है। उसने बचाव कार्य में घोर लापरवाही की ओर इशारा करते हुए बारह से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराया है। यह बेहद दुखद है कि एक नौजवान जान बचाने के लिए करीब डेढ़ घंटे तक गुहार लगाता रहा और बचाव दल मौके पर मूकदर्शक बने रहे। एसआइटी ने इसे गंभीर मानते हुए दमकल, पुलिस, प्राधिकरण और राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) की भूमिका पर सवालिया निशान लगाए हैं।
किसी घटना के तूल पकड़ लेने के बाद सरकार की ओर से जांच और कार्रवाई को लेकर गंभीर दिखने की कोशिश की जाती है, लेकिन कार्रवाई के निशाने पर आमतौर पर निचले स्तर के कर्मचारी आते हैं, जबकि वास्तविक जिम्मेदार लोगों को कठघरे में नहीं किया जाता। इस लिहाज देखें तो नोएडा में युवक के पानी में डूब जाने की घटना के बाद एसआइटी ने जिस तरह बारह अधिकारियों के खिलाफ अपनी रपट दी है, वह समस्या की जड़ों को पकड़ने की कोशिश है।
सवाल है कि सड़क किनारे किसी बड़े गड्ढे में पानी भरा हो, तो उसकी अनदेखी की मूल जिम्मेदारी किस पर जाती है। दरअसल, समस्या और उसके मूल कारणों के साथ-साथ वास्तविक जिम्मेदार लोगों की पहचान और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई वक्त की जरूरत है।
विडंबना यह है कि निर्माण स्थलों के पास पानी से भरे बड़े गड्ढों से लेकर कई बड़े नाले महीनों तक खुले रहते हैं और वहां अवरोधक, चेतावनी के संकेतक या सुरक्षा घेरा लगाने या अन्य कोई सुरक्षात्मक उपाय करना जरूरी नहीं समझा जाता। क्या इसी अनदेखी का नतीजा कई बार त्रासद नहीं होता? क्या यह उच्च स्तर के अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा नहीं होता? हादसे के बाद आमतौर पर सभी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने लगते हैं। ऐसे में एसआइटी ने जिस तरह बारह अधिकारियों को जिम्मेदार बताया है, वह भविष्य में ऐसी घटनाओं या हादसों को रोकने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण है।
