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भविष्य का खाता

कर्मचारी भविष्यनिधि में अंशदान की व्यवस्था इस मंशा के साथ की गई है कि नौकरी पूरी करने के बाद लोगों को आर्थिक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

Author नई दिल्ली | April 21, 2016 2:20 AM
एम्प्लॉय प्रोवीडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (Photo- financial express)

आखिरकार सरकार को कर्मचारी भविष्यनिधि खाते से रकम निकासी संबंधी अपने फैसले को वापस लेना पड़ा। सरकार ने फरवरी में अधिसूचना जारी की थी कि कर्मचारी अपने भविष्यनिधि खाते का पूरा पैसा अट्ठावन साल की उम्र पूरी होने के बाद ही निकाल सकेंगे। अगर घर बनाने, गंभीर बीमारी का इलाज कराने या फिर बच्चों की महंगी पढ़ाई के लिए उन्हें पैसा निकालने की जरूरत होगी तो वे सिर्फ अपने अंशदान से रकम निकाल सकेंगे, नियोक्ता का अंशदान नहीं निकाल सकेंगे। इस पर कर्मचारी संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया। खासकर बंगलुरू में कपड़ा कर्मचारियों के संगठन ने उग्र रूप धारण कर लिया। इसके मद्देनजर सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। अब पुराने नियमों के तहत कर्मचारी अपने भविष्यनिधि खाते में जमा पैसा निकाल सकेंगे।

कर्मचारी भविष्यनिधि में अंशदान की व्यवस्था इस मंशा के साथ की गई है कि नौकरी पूरी करने के बाद लोगों को आर्थिक परेशानियों का सामना न करना पड़े। मगर इसके साथ यह भी व्यवस्था है कि घर बनाने, बच्चों की उच्च शिक्षा, गंभीर बीमारी के इलाज आदि जैसे कामों के लिए कर्मचारी कुछ शर्तों के साथ अपने भविष्यनिधि खाते में जमा रकम निकाल सकते हैं। मगर देखा जाता है कि कुछ लोग इन उपबंधों के बहाने पैसा निकाल कर दूसरे मदों में खर्च कर देते हैं। इसलिए कुछ कर्मचारी संगठनों की मांग थी कि भविष्यनिधि से पैसा निकालने संबंधी नियमों को कठोर बनाया जाए। उसी के मद्देनजर सरकार ने अट्ठावन साल की उम्र से पहले पैसा निकालने पर पाबंदी लगाने संबंधी अधिसूचना जारी की थी।

हालांकि अब भविष्यनिधि खाते का संचालन कंप्यूटरीकृत हो चुका है। कर्मचारियों को विशेष खाता संख्या उपलब्ध करा दी गई है, जिससे अगर कोई नौकरी बदलता है तो उसे अपने भविष्यनिधि की रकम को हस्तांतरित करने की झंझट से मुक्ति मिल गई है। इसलिए कर्मचारियों के लिए ज्यादा सहूलियत हो गई है। मगर हकीकत यह भी है कि निजी कंपनियों में काम करने वाले लोगों को अक्सर असुरक्षित वातावरण में काम करना पड़ता है। कई बार उन्हें नौकरी छोड़नी या बदलनी पड़ती है। ऐसे में जिस दौरान उनके पास नौकरी नहीं होती, उनके लिए बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, बीमारी के इलाज आदि के खर्चे उठाना मुश्किल हो जाता है। इन स्थितियों में कर्मचारियों पर अट्ठावन की उम्र का नियम लागू कर दिया जाना उन्हें कठिनाई में डालना होता। इन्हीं मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए नियम बना था कि अगर कोई कर्मचारी दो महीने से अधिक नौकरी से बाहर है तो वह अपना अंशदान निकाल सकता है, नियोक्ता का अंशदान नहीं निकाल सकता। इस तरह से भी कर्मचारी के भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का ध्यान रखा गया था।

कर्मचारी भविष्यनिधि में जमा रकम सरकार के लिए खासी बड़ी पूंजी होती है, अगर उसे निकालने संबंधी नियमों को कड़ा नहीं बनाया जाए तो न सिर्फ कुछ कर्मचारी उसे बेवजह खर्च करते रहेंगे, बल्कि उससे सरकार के कामकाज पर भी असर पड़ेगा। अट्ठावन की उम्र संबंधी नियम लागू करने से सरकार के पास अधिक समय तक कर्मचारी का अंशदान जमा रहने की संभावना थी। इससे उसकी विकास परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद बन सकती थी। मगर चूंकि कर्मचारी को अपने जमा धन को गाढ़े समय में इस्तेमाल करने का हक है, सरकार के अट्ठावन की उम्र से पहले उसे न निकाले जा सकने संबंधी अधिसूचना पर विरोध स्वाभाविक था। इसलिए उस अधिसूचना को वापस लेने का सरकार का फैसला उचित है।

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