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संपादकीय: योजना की गति

भूजल के गिरते स्तर और भावी संकट से निपटने के मद्देनजर सरकार ने करीब ढाई साल पहले ‘अटल भूजल योजना’ लाने की बात कही थी। इसके तहत अत्यधिक भूजल दोहन वाले सात राज्यों- गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सामुदायिक हिस्से के साथ भूजल प्रबंधन करने का मकसद तय किया गया है।

सरकारी योजनाओं की जितनी तेजी से घोषणा की जाती है, उतनी तेजी से उस पर अमल करने की कोशिश नहीं की जाती है।

जन-कल्याण से संबंधित योजनाओं की घोषणा और उस पर अमल को लेकर सरकारें कितनी गंभीर रही हैं, इसके उदाहरण अक्सर सामने आते रहे हैं। ज्यादातर घोषित योजनाएं अमल के इंतजार में सालों लटकी रहती हैं और उनका लाभ सही समय पर आम लोगों तक नहीं पहुंच पाता है तो इसकी आखिर क्या वजह हो सकती है? देश के तमाम प्रभावित इलाकों में भूजल संसाधनों के स्थायी और ठोस प्रबंधन से जुड़ी ‘अटल भूजल योजना’ वैसी तमाम योजनाओं में से एक उदाहरण है कि सरकार घोषणा करने में तो कोई कोताही नहीं बरतती, लेकिन उसी मुताबिक वह जमीन पर भी उतरे, इससे उसका शायद बहुत ज्यादा सरोकार नहीं होता।

लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में जल शक्ति राज्यमंत्री ने बताया कि वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान ‘अटल भूजल योजना’ के लिए मंत्रालय ने दो सौ करोड़ रुपए आबंटित किए हैं, जिसमें से अब तक चौवन लाख रुपए का प्रयोग हुआ है। सवाल है कि इस साल एक अप्रैल को लागू होने के बाद करीब पांच महीनों के दौरान इतनी कम राशि का इस्तेमाल हो पाना आखिर क्या दर्शाता है? योजना तैयार करने और उस पर अमल को लेकर जो प्रारूप और लक्ष्य तय किए जाते हैं, क्या यह बिल्कुल उसी मुताबिक है?

गौरतलब है कि भूजल के गिरते स्तर और भावी संकट से निपटने के मद्देनजर सरकार ने करीब ढाई साल पहले ‘अटल भूजल योजना’ लाने की बात कही थी। इसके तहत अत्यधिक भूजल दोहन वाले सात राज्यों- गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सामुदायिक हिस्से के साथ भूजल प्रबंधन करने का मकसद तय किया गया है। अव्वल तो इस तरह के व्यापक महत्त्व की योजनाओं पर एक राय बनने, उसका प्रारूप तैयार होने से लेकर लागू होने तक में सालों लग जाते हैं।

विंडबना यह है कि इसके बाद भी उस पर अमल को लेकर संबंधित महकमे अपेक्षित तत्परता और गंभीरता नहीं बरत पाते। अपनी शुरुआत के महीनों में ही ‘अटल भूजल योजना’ एक तरह की शिथिलता का शिकार नजर आ रही है। लेकिन सवाल है कि अगर यही रफ्तार रही तो क्या अगले पांच सालों के लिए निर्धारित छह हजार करोड़ रुपए के खर्च और उसी के मुताबिक काम के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकेगा?

खुद केंद्रीय भूजल बोर्ड और राज्य भूजल विभागों के आंकड़ों में यह बताया गया है कि देश में कुल मूल्यांकित साढ़े छह हजार से ज्यादा इकाइयों में से एक हजार से ज्यादा इकाइयों को अत्यधिक दोहन वाली इकाइयों की श्रेणी में रखा गया है और उन्हें ‘डार्क जोन’ यानी पानी के संकट की स्थिति वाले क्षेत्र कहा जाता है। ‘अटल भूजल योजना’ उन्हीं क्षेत्रों में भूजल के स्तर को बढ़ाने के मकसद से शुरू की गई है, जहां यह काफी नीचे चला गया है। हालांकि इस योजना की घोषणा से पहले भी प्रधानमंत्री ने एक-एक बूंद के संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान शुरू करने पर जोर दिया था।

मुश्किल यह है कि भारी पैमाने पर पानी का बेलगाम उपयोग और उससे मुनाफा कमाने या उसकी बर्बादी करने वाली कंपनियों पर शायद ही किसी का कोई नियंत्रण है। यह गांवों और शहरों में वर्षा जल के संरक्षण को लेकर सजगता नहीं होने, भूजल का स्तर गिरते जाने और इससे पैदा होने वाली समस्या से अलग एक ऐसा पहलू है जिसमें भारी मात्रा में पानी का बेजा इस्तेमाल होता है। जाहिर है, अब तक जल प्रबंधन में कोताही ने आज भूजल के गिरते स्तर और भावी संकट की एक बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। अगर समय रहते इससे नहीं निपटा गया तो आने वाले हालात की बस कल्पना की जा सकती है!

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