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संपादकीयः अंधविश्वास की पंचायत

राजस्थान में बूंदी जिले के हिंडौली कस्बे में एक बच्ची के साथ वहां की पंचायत ने जो बर्ताव किया, वह इक्कीसवीं सदी का सफर तय कर रहे देश में तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों के बरक्स एक असहज कर देने वाली चुनौती है।

Author July 14, 2018 4:09 AM
बच्ची का पांव पड़ने से टिटहरी का अंडा फूट गया और यह पंचायत की नजर में एक बड़ा अपशगुन था।

राजस्थान में बूंदी जिले के हिंडौली कस्बे में एक बच्ची के साथ वहां की पंचायत ने जो बर्ताव किया, वह इक्कीसवीं सदी का सफर तय कर रहे देश में तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों के बरक्स एक असहज कर देने वाली चुनौती है। बच्ची का पांव पड़ने से टिटहरी का अंडा फूट गया और यह पंचायत की नजर में एक बड़ा अपशगुन था। यह इतनी बड़ी चिंता का मामला हो गया कि पंचायत ने आनन-फानन में बैठक करके उस बच्ची के सामाजिक बहिष्कार की सजा सुना दी। इसके बाद बच्ची को जाति से बाहर कर दिया गया और उसे करीब दस दिन तक अपने घर के बाहर तेज गरमी में टीन से बने शेड में रहना पड़ा। उसके साथ जानवरों जैसा सलूक किया गया, उसकी थाली में दूर से ही खाना फेंक कर दिया जाता था। यही नहीं, उसकी मां को भी उससे नहीं मिलने दिया जाता था। पिता ने जब विरोध किया तो बच्ची की सजा बढ़ा दी गई। इसके अलावा, गाय, मछली और कबूतर को चारा देने के साथ-साथ पंचायत को नमकीन और अंग्रेजी शराब की बोतल देने का जुर्माना लगाया गया। यह सब कुछ सिर्फ इस अंधविश्वास के तहत किया गया कि टिटहरी का अंडा फूटने से समाज पर संकट आ सकता है।

यह घटना अंधविश्वास का इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं है। आए दिन बेमानी धारणाओं के चलते जान-माल के नुकसान की खबरें आती रहती हैं। यहां तक कि किसी तांत्रिक के कहने पर बलि के नाम पर बच्चों की जान भी ले ली जाती है। कई बार व्यक्ति अपने स्तर पर इनसे बचना भी चाहता है तो समूह के रूप में समुदाय का दबाव उसे लाचार कर देता है। स्थानीय स्तर पर पंचायत की बैठक करके अपशगुन जैसे भ्रम का खौफ फैलाया जाता है। इसके बाद वहां मौजूद भोले-भाले लोगों से लेकर बच्चों तक के भीतर अंधविश्वास और गहरे पैठ जाता है, किसी व्यक्ति या समाज के सोचने-समझने की क्षमता और संवेदना को बाधित कर देता है। इसके असर में उलझे लोगों को यह खयाल रखना भी जरूरी नहीं लगता कि उनके फैसले या व्यवहार से किसी मासूम की जान जा रही है या अपना ही कोई बड़ा नुकसान हो रहा है। किसी भ्रम या बेमानी कल्पनाओं में डूबे लोगों को न यथार्थ के बारे में सोचना जरूरी लगता है, न कानूनी कार्रवाई को लेकर वे फिक्रमंद होते हैं। खासतौर पर रीति-रिवाजों या मान्यताओं के नाम पर कानून को धता बता कर दिए गए पंचायतों के फैसले कई बार अन्याय को बढ़ावा या संरक्षण देते हैं। लेकिन पंचायतों के खिलाफ सरकार और प्रशासन के ढीले-ढाले रवैये की वजह से यह समस्या जटिल बनी रहती है।

दरअसल, अंधविश्वासों को हकीकत मानने का कारण जितना लोगों की अज्ञानता है, उससे ज्यादा इसकी जिम्मेदारी सरकार की बनती है। संविधान की धारा- 51 ए के तहत समाज में वैज्ञानिक चेतना का प्रचार-प्रसार सरकार का दायित्व है। लेकिन आमतौर पर धर्म और परंपरा के नाम पर सरकारें अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों की ओर से आंखें मूंद लेती हैं, जबकि अंधविश्वासों को दूर करने के लिए वैज्ञानिक और तार्किक सोच के प्रचार-प्रसार को अपना मुख्य कार्यक्रम बनाना उसे कभी जरूरी नहीं लगता। यह बेवजह नहीं है कि ग्रामीण इलाकों के अशिक्षित लोगों से लेकर शहरों में खुद को आधुनिक कहने वाले भी कई बार अंधविश्वासों में डूबे दिखाई देते हैं। हालत यह है कि आज अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल भी अंधविश्वास और फर्जी धारणाएं फैलाने में किया जा रहा है। सवाल है कि हमारा समाज विज्ञान की चेतना के मामले में जहां अनुपस्थित दिखता है, उसमें अंतरिक्ष में चंद्रयान या मंगलयान जैसे तमाम वैज्ञानिक अभियानों की कामयाबी को किस नजर देखा जाना चाहिए!

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