ताज़ा खबर
 

संपादकीयः कुप्रबंधन का रोग

सरकार ने हस्तक्षेप कर दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुकी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी इन्फ्रास्क्ट्रचर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आइएलएंडएफएस) को बचाने की दिशा में जो कदम उठाया है, उससे बाजार और निवेशकों को बड़ी राहत मिली है।

Author October 4, 2018 3:23 AM
कारपोरेट क्षेत्र में कुप्रबंधन की बीमारी किस तरह से गहराई तक पैठी हुई है, यह आइएलएंडएफएस के प्रकरण से साफ पता चलता है।

सरकार ने हस्तक्षेप कर दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुकी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी इन्फ्रास्क्ट्रचर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आइएलएंडएफएस) को बचाने की दिशा में जो कदम उठाया है, उससे बाजार और निवेशकों को बड़ी राहत मिली है। इस कंपनी की असलियत उजागर होने के बाद पिछले दिनों शेयर बाजार में जिस तरह से गिरावट का दौर बना, उससे निवेशकों की नींद उड़ गई थी। इसलिए सरकार ने सक्रियता दिखाई और कंपनी के प्रबंधन को बदलने जैसा बड़ा फौरी कदम उठाया। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने सरकार की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए आइएलएंडएफएस के पुराने निदेशक मंडल को हटा कर नए निदेशक मंडल को हरी झंडी दे दी। नया निदेशक मंडल कंपनी को संकट से निकाल पाने में कितना सफल हो पाता है, यह तो बाद की बात है, लेकिन फिलहाल निवेशकों ने राहत की सांस ली है।

कारपोरेट क्षेत्र में कुप्रबंधन की बीमारी किस तरह से गहराई तक पैठी हुई है, यह आइएलएंडएफएस के प्रकरण से साफ पता चलता है। पूरा घटनाक्रम बताता है कि आइएलएंडएफएस एक लावारिस कंपनी की तरह की चलती रही। अगर जांच और निगरानी का काम सतत चलता और वक्त रहते हालात सामने आ जाते तो कंपनी को डूबने से बचाया जा सकता था। यह गंभीर सवाल है कि जिस कंपनी पर साल भर के भीतर सौ अरब रुपए से ज्यादा का कर्ज चढ़ गया हो, उसकानिदेशक मंडल कैसे चुप्पी साधे रहा? पंजाब नेशनल बैंक सहित अब तक जितने भी बैंक घोटाले और दूसरे कंपनी घोटाले सामने आए हैं, सबमें पहली बात यही सामने आई है कि संस्थानों को मनमर्जी से चलाया गया और शीर्ष प्रबंधन ऐसी अराजकता पैदा करता रहा जो पूरे प्रबंधन को चौपट कर दे। सरकार की आंख तब खुली जब आइएलएंडएफएस ने पिछले दो महीनों में अपनी तीन बड़ी देनदारियों का भुगतान करने में हाथ खड़े कर दिए।

आइएलएंडएफएस का मामला वित्तीय तंत्र में मची अंधेरगर्दी का नायाब नमूना कहा जा सकता है। नगदी संकट के बाद भी कंपनी ने प्रबंधन के ऊंचे ओहदेदारों को मोटा वेतन और लाभांश देना जारी रखा। अब सबके हाथ-पांव इसलिए फूल रहे हैं कि आइएलएंडएफएस पर इनक्यानवे हजार करोड़ का कर्ज चढ़ चुका है। कंपनी को इस संकट से कैसे निकाला निकाला जाए, इसका इलाज किसी के पास नहीं है। इस कंपनी ने बुनियादी क्षेत्र की कई कंपनियों को कर्ज दे रखा है। यह कंपनी बड़े ठेके हासिल करती है और उस फिर उन ठेकों को बड़े पूंजीपतियों के हवाले कर देती है। लंबे समय से आइएलएंडएफएस और इसकी सहायक कंपनियों में बड़ा घोटाला चल रहा था। अब इस मामले की जांच गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआइओ) कर रहा है।

आइएलएंडएफएस में एलआइसी, भारतीय स्टेट बैंक, सेंट्रल बैंक का बड़ा निवेश है। जैसे जिंदा रहने के लिए सांस जरूरी है, वैसे ही आइएलएंडएफएस के लिए सबसे पहली जरूरत नगदी के बंदोबस्त की है। सरकार ने इसमें पैसा डालने के साथ ही बड़े एलआइसी, एसबीआइ, सेंट्रल बैंक और जापान के की ओरिक्स कॉर्प को भी इसका बोझ उठाने को कह दिया है। ऐसे में इन वित्तीय संस्थानों और कंपनियों के सामने भी बड़ा जोखिम है। नया निदेशक मंडल जो कदम उठाए, लेकिन मौजूदा जोखिम को कम करना बड़ी चुनौती है। हालांकि उम्मीद इसलिए रखनी चाहिए कि 2009 में भी सत्यम घोटाले में सरकार ने दखल दिया था और हालात संभाल लिए थे। लेकिन उसकी तुलना में इस कंपनी का घोटाला काफी बड़ा है। सवाल है कि आइएलएंडएफएस को इस हालत में पहुंचाने वाले क्या न्याय के कठघरे में आ पाएंगे?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App