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बीमारी और सवाल

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में जापानी बुखार हर साल फैलता है। लेकिन इस बार मौतों का आंकड़ा जिस तेजी से बढ़ा है, वह राज्य सरकार की घोर लापरवाही का ही परिणाम है। ये बच्चे बुखार से कम, सरकार के भ्रष्ट और लाचार तंत्र के कारण ज्यादा मर रहे हैं।

Author June 17, 2019 1:21 AM
बिहार में पिछले दस दिन में दिमागी बुखार, जिसे जापानी बुखार भी कहा जाता है, से अब तक नब्बे बच्चों की मौत हो चुकी है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

इक्कीसवीं सदी के भारत में अगर दिमागी बुखार जैसी बीमारी से बच्चे रोजाना दम तोड़ते रहें और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे तो इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता। बिहार में पिछले दस दिन में दिमागी बुखार, जिसे जापानी बुखार भी कहा जाता है, से अब तक नब्बे बच्चों की मौत हो चुकी है। बच्चों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा। मौतों का यह आंकड़ा तो उन बच्चों का है जो अस्पताल में भर्ती थे और इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। लेकिन अगर ऐसी कोई वायरस संक्रमण जन्य बीमारी फैली है तो इससे पीड़ित बच्चों की संख्या तो काफी ज्यादा ही होगी। चिंता की बात तो यह है कि पिछले दस दिनों के भीतर डॉक्टर यह भी पता नहीं लगा पाए हैं कि आखिर इस बुखार का कारण क्या है। राज्य के करीब बारह जिले इस बुखार की चपेट में हैं। मुजफ्फरपुर के अस्पतालों में ढाई सौ से ज्यादा बच्चे भर्ती हैं। ज्यादातर पीड़ित बच्चे ग्रामीण इलाकों के हैं। राज्य में बच्चों की मौतों का सिलसिला कई दिनों से चल रहा है लेकिन सरकार कई दिन बाद हरकत में आई और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री शुक्रवार को पहली बार मुजफ्फरपुर पहुंचे। यह बिहार सरकार की संवेदनहीनता को बताने के लिए काफी है।

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में जापानी बुखार हर साल फैलता है। लेकिन इस बार मौतों का आंकड़ा जिस तेजी से बढ़ा है, वह राज्य सरकार की घोर लापरवाही का ही परिणाम है। ये बच्चे बुखार से कम, सरकार के भ्रष्ट और लाचार तंत्र के कारण ज्यादा मर रहे हैं। सवाल तो यह उठता है कि जब हर साल जापानी बुखार फैलता है तो उसे रोकने के स्थायी समाधान क्यों नहीं तलाशे जाते। पिछली घटनाओं से सीख क्यों नहीं ली जाती? जापानी बुखार के प्रकोप से उत्पन्न हालात का जायजा लेने के लिए जो केंद्रीय टीम बिहार के दौरे पर गई थी, उसकी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। केंद्रीय टीम ने साफ कहा कि इस बीमारी से निपटने के लिए राज्य सरकार के पास संसाधनों की जो स्थिति है, वह संतोषजनक नहीं है। इस तरह की बीमारियों से निपटने के लिए जिस तरह का ट्रॉमा सेंटर, सघन चिकित्सा कक्ष (आइसीयू), विशेषज्ञ डॉक्टर और नर्स होने चाहिए, वे नहीं हैं। अस्पतालों की हालत यह है कि दूसरे विभागों और कमरों में मरीजों को ठूंस कर काम चलाया जा रहा है। स्थिति बता रही है कि आमजन को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करा पाने में हमारी सरकारें किस तरह नाकाम साबित हो रही हैं।

सवाल है कि सरकारी अस्पताल इतने सुविधा-विहीन क्यों हैं, जहां जरूरत के मुताबिक न बिस्तर हैं, न आइसीयू, न पर्याप्त विशेषज्ञ डाक्टर और नर्सिंग स्टाफ है। हालत बता रही है कि अस्पताल खुद ही गंभीर बीमारी से संक्रमित हैं, जिसका इलाज करने की ताकत और इच्छा सरकार के पास नहीं बची है। इसका मतलब तो यह हुआ कि बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए जो पैसा रखा जाता है वह अस्पतालों, स्वास्थ्य सेवाओं पर तो खर्च ही नहीं हो रहा! बिहार में 1977 में पहली बार इस बीमारी का पता चला था। तब से लेकर अब तक एक लाख से ज्यादा बच्चों की जान चुकी है। अगर चार दशक में भी हम बीमारी का कारण नहीं खोज पाएं तो इससे बड़ी नाकामी क्या हो सकती है। अगर समय रहते कदम उठाए गए होते और बीमारी का पता लगाने के लिए शोध शुरू हो जाता तो आज कई घरों के चिराग बुझने से बचाए जा सकते थे।

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