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संपादकीयः मुनाफे का भंडारण

अब तक लोगों के जीवन से जुड़े ये खाद्यान्न आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में थे और कोई भी व्यापारी या कंपनी इनकी जमाखोरी और कालाबाजारी नहीं कर सकता था।

अब तक लोगों के जीवन से जुड़े ये खाद्यान्न आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में थे।

कृषि क्षेत्र में बेहतरी के दावे के साथ सरकार ने जो तीन नई कानूनी व्यवस्था की है, आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक उसमें एक है। किसानों के बीच इस मसले पर भी भारी विरोध और आक्रोश के बावजूद मंगलवार को राज्यसभा में भी इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया और इस तरह विधेयक को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल गई। अब कानून के रूप में लागू होने के बाद आलू, प्याज, अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर हो जाएंगे और इनके भंडारण पर लगी रोक हट जाएगी। इस मसले पर विपक्षी दलों और किसानों की तमाम आपत्तियों के बरक्स सरकार का मानना है कि नए प्रावधानों से उत्पादन, उत्पादों को जमा करने, आवागमन, वितरण और आपूर्ति की स्वतंत्रता से बड़े स्तर पर अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलेगा और कृषि क्षेत्र में निजी और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश आकर्षित होगा। लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि भंडारण के मामले में ज्यादातर किसानों की जो स्थिति है, उसमें संसाधनों और सुविधाओं से लैस बड़ी कंपनियां किसानों से अपनी शर्तों पर उनकी उपज खरीदेंगी और बेचेंगी।

गौरतलब है कि अब तक लोगों के जीवन से जुड़े ये खाद्यान्न आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में थे और कोई भी व्यापारी या कंपनी इनकी जमाखोरी और कालाबाजारी नहीं कर सकता था। अगर कभी भंडारण या जमाखोरी की शिकायत आती थी तब संबंधित महकमों की ओर छापे की कार्रवाई की जाती थी और इस तरह बाजार में कम से कम वैसी वस्तुओं की कीमतें नियंत्रित रहती थीं, जो लोगों के जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं। यानी इन वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखना और आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी थी। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि अब अनाज, दलहन, तिहलन, आलू और प्याज जैसी चीजों को आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी से बाहर कर देने का आधार क्या है! सरकार की दलील है कि सन 1955 में जब भंडारण पर रोक का कानून बना था तब कुल उपज बहुत कम थी। लेकिन सच यह है कि तब आबादी भी आज के मुकाबले काफी कम थी। आज हालत यह है कि रोजमर्रा के इस्तेमाल की बहुत सारी जरूरी चीजों की ऊंची कीमतों की वजह से आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी न्यूनतम जरूरतों को ही पूरा करने की कोशिश में जीता है। यह बेवजह नहीं है कि सिर्फ पेट भरने की जद्दोजहद में जीते बहुत सारे परिवारों के बीच कुपोषण के लिहाज से स्थिति बहुत दयनीय है।

ऐसे में खाने-पीने की सबसे जरूरी चीजों को ही आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी से बाहर कर दिए जाने का फैसला किसके हित में है? मौजूदा समय में आलू सहित खाने-पीने की सभी चीजों की कीमतें जिस तरह गरीब तबकों की पहुंच के बाहर होती जा रही हैं, उसमें इन वस्तुओं के भंडारण की आजादी के बाद खुले बाजार में क्या स्थितियां पैदा होंगी! इससे बड़े पूंजीपतियों का बेलगाम मुनाफा तो सुनिश्चित हो जाएगा, लेकिन किसानों और आम ग्राहकों की क्या हालत होगी? यह दलील दी जाती है कि खुले बाजार में प्रतिद्वंद्विता से कीमतें काबू में रहती हैं। सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर भी यही कहा था। लेकिन आज देखा जा सकता है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें किस कदर मध्यवर्ग के भी पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। महामारी और पूर्णबंदी के असर में पहले ही करोड़ों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं, एक बड़ी आबादी की आय या तो काफी घट गई है या फिर रुक गई है। ऐसे में बाजार में खाने-पीने की सबसे जरूरी वस्तुओं की कीमतें भी अगर बेलगाम हो गर्इं तो उसके असर का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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