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संपादकीय: भुखमरी के बरक्स अन्न की बर्बादी

विकास के नित-नए उपायों और प्रयासों के बीच वैश्विक भूख सूचकांक की ताजा रिपोर्ट में एक सौ उन्नीस देशों में भारत का एक सौ तीसरे पायदान पर होना इस तथ्य को रेखांकित करता है कि देश में भूख से निपटने की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है।

Author November 4, 2018 3:40 AM
रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश से भी पीछे है।

विकास के नित-नए उपायों और प्रयासों के बीच वैश्विक भूख सूचकांक की ताजा रिपोर्ट में एक सौ उन्नीस देशों में भारत का एक सौ तीसरे पायदान पर होना इस तथ्य को रेखांकित करता है कि देश में भूख से निपटने की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश से भी पीछे है। पड़ोसी देश चीन को पच्चीसवीं, बांग्लादेश को छियासीवीं, नेपाल को बहत्तरवीं, श्रीलंका को सड़सठवीं और म्यांमा को अड़सठवीं रैंक मिली है। जाहिर है, भारत की रैंकिंग सुधरने के बजाय लगातार गिर रही है, जिससे कई तरह के सवाल खड़े होते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो 2014 में भारत पचपनवें पायदान पर था, जो 2015 में खिसक कर अस्सीवें, 2016 में सत्तानबेवें और 2017 में सौवें पायदान पर आ गया। साफ है कि भुखमरी से निपटने के लिए अपनाई गई नीतियों में खामियां हैं। चिंतित करने वाली बात यह है कि रिपोर्ट में भारत को उन पैंतालीस देशों की सूची में रखा गया है, जहां भुखमरी की स्थिति अत्यंत गंभीर है।

दरअसल, वैश्विक भूख सूचकांक में दुनिया के तमाम देशों में खानपान की स्थिति का विस्तृत ब्योरा और इस बात का मूल्यांकन होता है कि लोगों को किस तरह का खाद्य पदार्थ मिल रहा है। उसकी गुणवत्ता और मात्रा कितनी है। लिहाजा उसकी रिपोर्ट को यों ही खारिज नहीं किया जा सकता। इस सूचकांक की शुरुआत 2006 में इंटरनेशनल फूड पॉलिसी इंस्टीट्यूट ने की और इसे वेल्टहंगरहिल्फ ऐंड कंसर्न वर्ल्डवाइड की ओर से जारी किया गया। इस सूचकांक के पिछले वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर वर्ष तकरीबन तीन हजार से अधिक लोगों की मौत भूख से हो रही है और मरने वालों में सर्वाधिक संख्या बच्चों की होती है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में सतहत्तर करोड़ लोग भूख पीड़ित थे, जो 2016 में बढ़ कर इक्यासी करोड़ हो गए। इसी तरह 2015 में अत्यधिक भूख पीड़ित लोगों की संख्या आठ करोड़ और 2016 में दस करोड़ थी, जो 2017 में बढ़ कर 12.4 करोड़ हो गई है। कहा जा सकता है कि वैश्विक भूख सूचकांक की रैंकिंग में पिछड़े देशों के पास भुखमरी से निपटन के लिए कोई ठोस नक्शा नहीं है और उसमें भारत भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र की मानें तो इन देशों में संवेदनहीनता के कारण भूख की समस्या और गहरा रही है। संयुक्त राष्ट्र का यह भी कहना है कि अगर भुखमरी पर अतिशीध्र काबू नहीं पाया गया तो 2035 तक दुनिया की आधी आबादी भूख और कुपोषण की चपेट में होगी, जिसमें सर्वाधिक संख्या भारतीयों की होगी। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर गौर करें तो भुखमरी के शिकार अधिकतर लोग विकासशील देशों में रहते हैं, जिनमें सबसे ज्यादा एशिया और अफ्रीका में हैं। इनमें भी सर्वाधिक संख्या भारतीयों की है।

निस्संदेह भुखमरी के लिए ढेर सारे कारण जिम्मेदार हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कारण जरूरतमंदों तक अनाज का न पहुंचना और अन्न की बर्बादी है। अन्न बर्बाद करने के मामले में भारत दुनिया के संपन्न देशों से भी आगे है। आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल उतना अन्न बर्बाद हो जाता है, जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। भारत में कुल पैदा किए जाने वाले भोज्य पदार्थ का चालीस फीसद हिस्सा बर्बाद हो जाता है। यानी हर साल भारत को अन्न की बर्बादी से तकरीबन पचास हजार करोड़ रुपए की चपत लगती है। यही नहीं, बर्बाद हो रहे भोजन से जलवायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है। नतीजतन, खाद्यान्नों में प्रोटीन और आयरन की मात्रा लगातार कम हो रही है।

खाद्य वैज्ञानिकों की मानें तो कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन की अधिकता के चलते भोजन से पोषक तत्त्व नष्ट हो रहे हैं, जिसके कारण चावल, गेहूं, जौ जैसे प्रमुख खाद्यान्न में प्रोटीन की कमी होने लगी है। आंकड़ों के मुताबिक चावल में 7.6 प्रतिशत, जौ में 14.1 प्रतिशत, गेहूं में 7.8 प्रतिशत और आलू में 6.4 प्रतिशत प्रोटीन की कमी दर्ज की गई है। अगर कार्बन उत्सर्जन की यही स्थिति रही तो 2050 तक दुनिया भर में पंद्रह करोड़ लोग इस नई वजह के चलते प्रोटीन की कमी का शिकार हो जाएंगे। यह दावा हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ ने अपनी रिपोर्ट में किया है, जो एनवायरमेंटल हेल्थ पर्सपेक्टिव जर्नल में प्रकाशित हुआ। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक भारतीयों की प्रमुख खुराक से 5.3 प्रतिशत प्रोटीन गायब हो जाएगा। इस कारण 5.3 करोड़ भारतीय प्रोटीन की कमी से जूझेंगे। अगर भोज्य पदार्थों में प्रोटीन की मात्रा में कमी आई तो भारत के अलावा उप-सहारा अफ्रीका के देशों के लिए भी स्थिति भयावह होगी, जहां लोग पहले से ही प्रोटीन की कमी और कुपोषण से जूझ रहे हैं। बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड के प्रभाव से सिर्फ प्रोटीन नहीं, आयरन कमी की समस्या भी बढ़ेगी। दक्षिण एशिया और उत्तर अफ्रीका समेत दुनिया भर में पांच वर्ष से कम उम्र के 35.4 करोड़ बच्चों और 1.06 महिलाओं के इस खतरे से ग्रस्त होने की आशंका है।

संयुक्त राष्ट्र के फूड एग्रीकल्चर आॅर्गनाइजेशन की रिपोर्ट से जाहिर हो चुका है कि सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद भारत में पिछले एक दशक में भुखमरी की समस्या में तेजी से वृद्धि हुई है। देश में आज भी तीस करोड़ लोग हर रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं, जबकि सरकारी गोदामों में हर वर्ष हजारों करोड़ रुपए का अनाज सड़ जाता है। अगर गोदामों के अनाजों को गरीबों में वितरित किया जाए तो भूख और कुपोषण से निपटने में मदद मिलेगी। गौरतलब है कि विश्व बैंक ने कुपोषण की तुलना ‘ब्लैक डेथ’ नामक उस महामारी से की है, जिसने अठारहवीं सदी में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था।

विश्व बैंक के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में कुपोषण की दर लगभग पचपन प्रतिशत है, जबकि उप-सहारा अफ्रीका में यह सताईस प्रतिशत के आसपास है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल भूख और कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है। लेकिन हाल में केंद्र सरकार ने भूख और कुपोषण से निपटने के लिए राष्ट्रीय पोषण मिशन का खाका तैयार किया है, जिसके तहत महिलाओं और बच्चों को पूरक पोषण दिया जाना सुनिश्चित हुआ है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकार ने बच्चों के पोषक देखभाल के लिए एक नई प्रणाली स्थापित की है और यह प्रणाली व्यक्तिगत परिवारों को पोषक अभिभावक के रूप में बच्चों की देखभाल के संबंध में है। इससे बाल देखभाल संस्थानों की तुलना में बच्चों की बेहतर तरीके से देखभाल और सुरक्षा हो सकेगी।

इस मिशन को जमीनी आकार देने में आंगनबाड़ी केंद्रों की प्रमुख भूमिका होगी और इसके लिए सरकार ने विश्व बैंक की सहायता से सुदृढ़ीकरण तथा पोषण सुधार कार्यक्रम से संबंधित समेकित बाल विकास सेवाएं प्रणाली के आठ राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 2534 सर्वाधिक पिछड़े प्रखंडों में दो लाख भवन बनाने की योजना को हरी झंडी दिखाई है। इसके अलावा असम, ओड़ीशा और तेलंगाना में ग्रामीण विकास मंत्रालय के मनरेगा योजना के अंतर्गत अगले चार वर्षों में प्रतिवर्ष पचास हजार भवन बनाया जाना सुनिश्चित हुआ है। लेकिन बात तब बनेगी जब देश में बर्बाद हो रहे अन्न का सदुपयोग हो और करोड़ों लोगों का पेट भरे। खाद्य विशेषज्ञों की मानें तो भोजन की बर्बादी रोके बिना भुखमरी, कुपोषण और गरीबी से नहीं निपटा जा सकता।

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