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संपादकीयः लापरवाही का रोग

सवाल है कि क्या यह केवल व्यवस्था में कोताही का मामला है? या फिर अस्पताल प्रबंधन के इस रुख का कारण महिला में कोरोना के संक्रमण का पाया जाना था?

Author Published on: June 6, 2020 2:50 AM
कोरोना से मौत के बाद महिला के शव को ले जाने के लिए भी अस्पताल प्रबंधन ने उसके परिवार को एंबुलेंस उपलब्ध नहीं करवाई।

देश फिलहाल महामारी के जिस संकट से गुजर रहा है, उसकी गंभीरता का अंदाजा सबको है। विडंबना यह है कि इस दौर में बहुत सारे लोगों को अपने बर्ताव का खयाल रखना जरूरी नहीं लग रहा। इसकी वजह से कोरोना संक्रमण की चपेट में आए लोगों या उनके परिवारों के साथ जिस तरह के बर्ताव की खबरें आ रही हैं, वे हैरान करने वाली हैं। ताजा उदाहरण गाजियाबाद के एक निजी अस्पताल का है, जहां इलाज के लिए गई एक चौवन वर्षीय महिला की मौत हो गई और उसमें कोरोना से संक्रमण की पुष्टि हुई थी। यों उसके परिवार का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने उपचार में भी लापरवाही बरती। लेकिन इस मामले में ज्यादा अफसोसनाक यह है कि मौत के बाद महिला के शव को ले जाने के लिए भी अस्पताल प्रबंधन ने उसके परिवार को एंबुलेंस उपलब्ध नहीं करवाई। बाद में अस्पताल के निदेशक ने सफाई दी कि कोई एंबुलेंस का ड्राइवर कोरोना संक्रमित मरीजों को ले जाने के लिए तैयार नहीं होता है। अगर इस आरोप में सच्चाई है तो क्या निदेशक की ओर से प्रशासन को इस बात की खबर दी गई थी या फिर प्रशासन की ओर से अस्पताल से लेकर एंबुलेंस चालकों तक के लिए कोई प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया गया है?

सवाल है कि क्या यह केवल व्यवस्था में कोताही का मामला है? या फिर अस्पताल प्रबंधन के इस रुख का कारण महिला में कोरोना के संक्रमण का पाया जाना था? जिस समय देश इस महामारी के संकट से दो-चार है और इससे लड़ने में खासतौर पर अस्पतालों और चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी भूमिका मानी गई है, उन्हें ‘कोरोना योद्धा’ के रूप में देखा जा रहा है, ऐसे में अस्पताल के रवैये से लेकर एंबुलेंस के ड्राइवर के बारे में बताई गई बात अफसोसजनक है। लेकिन यह केवल किसी खास अस्पताल की लापरवाही, एंबुलेंस नहीं मुहैया कराया जाना या ड्राइवर की लापरवाही का मामला नहीं है। जब से कोरोनावायरस के संक्रमण और उसके स्वरूप से संबंधित डराने वाली व्याख्याएं आम लोगों के बीच कही-सुनी जा रही हैं, तभी से इस मसले पर ज्यादातर लोगों के व्यवहार में एक बड़ा बदलाव आ गया है। कई इलाकों से ऐसी खबरें आईं कि जब कोई गरीब मजदूर गांव पहुंचा तो उसे लेकर आसपास के लोग कई तरह की आशंका से भर गए। कई जगहों पर लोगों के साथ दुर्व्यवहार भी हुआ।

ऐसे में यह एक स्वाभाविक सवाल है कि हमारा देश और खासतौर पर यहां का चिकित्सा तंत्र अगर कोरोना संदिग्धों या संक्रमितों के साथ उपेक्षापूर्ण तरीके से पेश आएगा, तब कहां से उम्मीद की जाएगी? यों सरकार की ओर से बार-बार यह कहा जा रहा है कि कोरोना संक्रमित मरीजों के साथ सकारात्मक तरीके से पेश आया जाए। संचार माध्यमों के जरिए से भी जनता का बीच यह संदेश पहुंचाया जा रहा है कि हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं। लेकिन इसके संक्रमण के स्वरूप और असर के खतरे से सबंधित सूचनाओं को जिस रूप में व्यापक पैमाने पर प्रचारित किया गया है, उसकी वजह से बहुत सारे लोगों के भीतर एक अनावश्यक डर बैठ गया है। नतीजतन, उनके व्यवहार में कोरोना के मामले का सामना कर रहे व्यक्ति के प्रति दूरी बनाने का भाव बैठ गया है। बचाव के लिए लोगों का आपस में दूर बरतना एक सावधानी का उपाय हो सकता है, लेकिन अगर यह ‘मन की दूरी’ और व्यवहार की उपेक्षा में तब्दील होने लगे तो दूरगामी दृष्टि से मनुष्य समाज के लिए घातक साबित होगा।

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