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संपादकीयः चिंता की दर

अब तक सरकार यही दोहराती रही थी कि नोटबंदी से आर्थिक वृद्धि दर पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।

Author June 2, 2017 03:09 am
2018-19 में भारत की आर्थिक विकास दर 7.2

अब तक सरकार यही दोहराती रही थी कि नोटबंदी से आर्थिक वृद्धि दर पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। लेकिन सरकार के इन दावों को खुद सरकारी आंकड़ों ने झुठला दिया है, और साथ ही, आर्थिक मामलों के बहुत-से जानकारों की यह आशंका सही साबित हुई है कि नोटबंदी के चलते वृद्धि दर में कमी आएगी। ये आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब अपने तीन साल पूरे होने पर मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीट रही है। आर्थिक वृद्धि दर में कैसी कमी आई है, सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़े गवाह हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक वित्तवर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च) में जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर घट कर 6.1 फीसद पर आ गई। यह हालत तब है जब सरकारी खर्च और कृषि से जीडीपी को सहारा मिला है। यह दिलचस्प है कि जिस समय प्रधानमंत्री स्पेन में भारतीय अर्थव्यवस्था के और मजबूत होने का भरोसा दिला रहे थे, उसी समय ये आंकड़े आए। अपने दावों पर पानी फिरता देख सरकार के माथे पर पसीना आना ही था। लिहाजा, वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बचाव में उतरने में तनिक देर नहीं की। उन्होंने सारा ठीकरा वैश्विक आर्थिक मंदी और पिछली सरकार पर फोड़ते हुए कहा कि वृद्धि दर में आई कमी का नोटबंदी से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन यह सफाई गले नहीं उतरती।

अगर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य और पिछली सरकार से विरासत में मिली ‘खराब अर्थव्यवस्था’ ही वृद्धि दर में गिरावट के कारण हैं, तो सवाल है कि बीते वित्तवर्ष की पहली तिमाही और पहली छमाही में गिरावट क्यों नहीं दिखी? बुधवार को जारी आंकड़े बताते हैं कि वित्तवर्ष 2016-17 में सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) महज 5.6 फीसद बढ़ा, जो कि दो साल में सबसे कम है। ह्रास का अंदाजा पिछले साल की तुलना से लगा सकते हैं। पिछले साल जीवीए 8 फीसद था, जबकि नोटबंदी वाली तिमाही में 5.9 फीसद। और कृषि तथा सरकारी खर्च को अलग करके देखें तो औद्योगिक तथा सेवा क्षेत्र का जीवीए चौथी तिमाही में (जब पूरी तिमाही नोटबंदी के असर में रही) महज 3.8 फीसद बढ़ा। हालांकि पूरे बीते वित्तवर्ष का जीवीए का आंकड़ा 6.6 फीसद है, पर यह भी तीन साल में सबसे कम है। यह आम अनुभव की बात है कि नोटबंदी से निर्माण और रीयल एस्टेट के कारोबार में मंदी आ गई। आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। निर्माण क्षेत्र में 3.7 फीसद तक गिरावट आई, जबकि वित्तीय क्षेत्र, रीयल एस्टेट और पेशेवर सेवा क्षेत्र सिर्फ 2.2 फीसद बढ़े। लेकिन क्या नोटबंदी का असर बीते वित्तवर्ष तक सीमित रहा? इसका जवाब पाने के लिए बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर के अप्रैल के आंकड़ों पर नजर डालें।

कच्चा तेल, कोयला व सीमेंट के उत्पादन में गिरावट के कारण आठ बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर चालू वित्तवर्ष के पहले महीने यानी अप्रैल में घट कर केवल ढाई फीसद रह गई। जबकि पिछले साल अप्रैल में यह आंकड़ा 8.7 फीसद था। अगर नोटबंदी के बावजूद कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र में 5.2 फीसद की खासी बढ़ोतरी हुई, तो यह अच्छे मानसून और किसानों की मेहनत के चलते हुआ। लेकिन किसानों को अपने श्रम का कैसा लाभ मिला? वे अपनी पैदावार का उचित दाम पाने के लिए तरस रहे हैं। बहुतों को लागत भर की कीमत भी नहीं मिल पा रही है। ऐसे में कई जगह से उपज को कचरे की तरह फेंक देने और कई जगह से किसानों के खुदकुशी करने की भी खबरें आई हैं। यह उस पार्टी के राज में हो रहा है जिसने पिछले लोकसभा चुनाव में किसानों को लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाने की व्यवस्था करने का वादा किया था।

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