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संपादकीयः न्यायिक ऊहापोह

समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने के खिलाफ दायर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपे जाने से इस मसले पर छाई वैधानिक धुंध छंटने के आसार हैं।
Author February 4, 2016 02:40 am

समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने के खिलाफ दायर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपे जाने से इस मसले पर छाई वैधानिक धुंध छंटने के आसार हैं। सर्वोच्च अदालत ने दो साल पहले समलैंगिक वयस्कों के बीच स्वेच्छा से कायम होने वाले यौन संबंध को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत अपराध की श्रेणी में रखने का फैसला सुनाया था।

उस फैसले के बाबत अब कोर्ट का कहना है कि चूंकि धारा 377 के खिलाफ याचिकाओं में संवैधानिक महत्त्व के अनेक बिंदु शामिल हैं, इसलिए बेहतर होगा कि इस पर पुनर्विचार किया जाए। गौरतलब है कि ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 1861 में भारतीय दंड संहिता में धारा 377 शामिल की गई थी। इसके तहत समलैंगिकों के बीच यौन संबंध को अपराध माना गया था, क्योंकि यह ‘प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ है।

मौजूदा कानून के अनुसार दो पुरुषों के बीच शारीरिक संबंध अपराध की श्रेणी में आता है, जिसके लिए उम्र कैद तक की सजा हो सकती है। समलैंगिक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन लंबे अरसे से इस कानून को खत्म करने की मांग करते रहे हैं। इनकी याचिकाओं पर दिल्ली हाईकोर्ट ने 2 जुलाई, 2009 को अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि अगर दो वयस्क सहमति से समलैंगिक संबंध बनाते हैं तो यह धारा 377 के तहत अपराध नहीं होगा। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, तो दिसंबर 2013 में उसने हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया और समलैंगिकता फिर कानून की नजर में अपराध हो गई।

अपराध के दायरे में समलैंगिकता की आवाजाही का यह जटिल प्रश्न अरसे से न केवल कानूनविदों, बल्कि समाजशास्त्रियों के लिए भी चिंता का विषय रहा है। ऐसे में संविधान पीठ के जरिए इसका स्थायी उत्तर हासिल करना वक्त की जरूरत है। हमारे यहां पारंपरिक नैतिकता और यौन जरूरतों के बीच टकराव के साथ ही समलैंगिक संबंधों की वैधता का मुद्दा अरसे से न्यायिक ऊहापोह का भी शिकार रहा है। यह ऊहापोह सरकार से लेकर हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पलटे जाने और फिर सुप्रीम कोर्ट के अपने ही निर्णय पर पुनर्विचार याचिकाएं स्वीकार कर उन्हें संविधान पीठ को सौंपे जाने तक पसरा है।

समाज का एक बड़ा तबका जहां समलैंगिकता को पश्चिम और पोर्न जगत से आई ‘बीमारी’ ठहरा कर नाक-भौं सिकोड़ता है वहीं दूसरा वर्ग सभा-संगोष्ठी, जुलूस-प्रदर्शन वगैरह आयोजित कर उसे सहज मानवीय पसंद, जरूरत और नितांत निजी आजादी से जोड़ कर इसमें कानून या समाज की ताकझांक तथा अडंगेबाजी पर आंखें तरेरता है।

उधर चिकित्सा विज्ञानियों ने भी इंसानी यौन व्यवहार और प्राथमिकताओं के विभिन्न अध्ययनों के हवाले प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि कुछ स्त्री-पुरुष हार्मोनों और क्रोमोजोम्स की न्यूनाधिक मात्रा या असंतुलन भी इंसानी यौन-व्यवहार और पसंद को निर्धारित करते हैं और समलैंगिक संबंधों की ओर रुझान इसी से तय होता है। कुछ पश्चिमी देशों ने इन्हीं जैव वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर अपने यहां समलैंगिकता को वैधता प्रदान कर दी है। हमारे यहां इस पर क्या फैसला आता है यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन बंद कमरों तक सीमित सहमति से कायम संबंधों की वैधानिकता का मुद्दा एकबारगी सुलझा लिया जाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हमारे मूल अधिकार की स्पष्टता के लिए भी जरूरी है

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