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संपादकीयः गंगा की दशा

तीन दशक से ज्यादा वक्त से गंगा की सफाई के लगातार दावे किए गए, योजनाएं बना कर उन पर काम करने की बात कही गई।

Author Published on: May 19, 2017 3:22 AM
Pitru Paksha Amavasya Puja Vidhi: पितृपक्ष श्रद्धा के अवसर पर पवित्र नदी गंगा में स्नान करते श्रद्धालु। (Photo: ANI)

तीन दशक से ज्यादा वक्त से गंगा की सफाई के लगातार दावे किए गए, योजनाएं बना कर उन पर काम करने की बात कही गई। लेकिन इतनी लंबी अवधि के दौरान सरकारीदावों की हकीकत यह है कि अब गंगा का पानी पीने लायक तो दूर, नहाने के लायक भी नहीं बचा है। सूचनाधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में खुद सरकार ने यह माना है। सीपीसीबी यानी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक गंगोत्री से हरिद्वार के बीच करीब तीन सौ किलोमीटर की गंगा में से ग्यारह स्थानों से नमूने जांच के लिए लिये गए थे, लेकिन ये सभी सुरक्षा मानकों पर फेल रहे। रिपोर्ट के मुताबिक हरिद्वार के करीब बीस गंगा घाटों पर हर रोज पचास हजार से एक लाख लोग नहाते हैं। यह बेवजह नहीं है कि गंगा के पानी में बीओडी यानी बॉयोलॉजिकल आॅक्सीजन डिमांड और कोलिफॉर्म यानी बैक्टीरिया के अलावा दूसरे जहरीले पदार्थों की मात्रा निर्धारित मानकों के मुकाबले काफी अधिक है। 1985 में गंगा की सफाई के लिए शुरू की गई गंगा कार्य योजना अब नमामि गंगे के रूप में सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा है। बीते तीस सालों के दौरान इस मद में बाईस हजार करोड़ से ज्यादा रुपए बहाए जा चुके हैं।

भाजपा सरकार बनने के बाद केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्री उमा भारती ने कहा था कि अगले तीन साल के भीतर गंगा साफ हो जाएगी। गंगा को लेकर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर भावुकता से भरे बयान देते रहे हैं। लेकिन नमामि गंगे जैसी योजना और लगातार सरकारी कार्यक्रमों में गंगा के माहात्म्य के उल्लेख के बावजूद खुद सरकार यह मान रही है कि गंगा का पानी नहाने तक के लायक नहीं बचा, तो अब तक की कवायदों को किस नजरिए से देखा जाएगा! कानपुर या दूसरे शहरों में औद्योगिक इकाइयों और सीवर आदि की वजह से पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी यह नदी अगर हरिद्वार में भी इस हालत में चली गई है तो इसके लिए कौन जिम्मेवार है? पर्यावरणविदों ने इस समस्या की ओर ध्यान दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

इस बीच धीरे-धीरे हरिद्वार में औद्योगिक इकाइयों की शृंखला खड़ी हो गई और यह पर्यटन का केंद्र बन गया। लेकिन उसके बरक्स जलशोधन संयंत्रों और गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था करना जरूरी नहीं समझा गया। पचास हजार से एक लाख लोग जहां रोज नहाने पहुंचते हों, वहां उससे उपजी गंदगी और दूसरी समस्याओं के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है। हमारे देश में गंगा के प्रति श्रद्धा-भाव तो अपार है, पर वास्तव में गंगा की फिक्र कितनी है? एक ओर सुप्रीम कोर्ट गंगा के मसले पर केंद्र सरकार को फटकार लगा चुका है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने यहां तक कह चुका है कि इस मामले में सरकार का काम उसके नारों से उलट रहा है। सवाल है कि किसकी जवाबदेही बनती है?

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