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निष्ठुर सिपाही

आम लोगों से किस तरह पेश आना चाहिए, इसका समुचित प्रशिक्षण शायद हमारे पुलिस बल को नहीं है।

Author October 3, 2015 5:06 PM

आम लोगों से किस तरह पेश आना चाहिए, इसका समुचित प्रशिक्षण शायद हमारे पुलिस बल को नहीं है। इसी का नतीजा है कि वह अक्सर डंडे फटकार कर नियम-कायदों का पालन कराने का प्रयास करता है। कई बार यह प्रवृत्ति सारी हदें लांघ जाती है। मुंबई में मानसिक रूप से कमजोर युवती की पिटाई इसका ताजा उदाहरण है।

गौरतलब है कि युवती अपने परिजनों के साथ गणेशोत्सव की झलकियां देखने गई थी। वह सामान्य प्रवेश-द्वार के बजाय विशिष्ट लोगों के लिए बने रास्ते से जाने लगी। रोके जाने पर उसने जिद की तो वहां मौजूद कई महिला पुलिसकर्मियों ने मिल कर उसकी बेरहमी से पिटाई कर दी। बीच-बचाव करने आई उसकी मां और भाई की भी पिटाई की।

फिर थाने ले जाकर उन पर बारह सौ रुपए का जुर्माना लगा दिया। इस घटना का वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो हकीकत सामने आई कि पुलिस को जिस धैर्य और विवेक का परिचय देना चाहिए था, उसने नहीं दिया। हैरानी की बात है कि उस युवती के असामान्य व्यवहार से पुलिसकर्मियों को अंदाजा क्यों नहीं लग पाया कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है।

आमतौर पर मुंबई में गणेशोत्सव के दौरान भीड़भाड़ इतनी अधिक होती है कि पुलिस को अतिरिक्त मुस्तैदी बरतनी पड़ती है; काफी तनाव झेलना पड़ता है। मगर इस दलील के आधार पर मुंबई पुलिस के ताजा व्यवहार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह पहली घटना नहीं है, जब विशिष्ट लोगों की सुरक्षा के नाम पर किसी सामान्य नागरिक को बेरहमी से पीटा गया।

अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब विशिष्ट लोगों के काफिले के बीच आ जाने या उनके सुरक्षा घेरे में किसी गलतफहमी के चलते घुस जाने पर सुरक्षाकर्मियों ने लोगों की बुरी तरह पिटाई की। हालांकि मुंबई में जहां यह घटना हुई, वहां कोई वीआइपी नहीं था, जिससेपुलिसकर्मियों को वह युवती खतरा नजर आई होगी। अब पुलिस अधिकारियों की दलील है कि युवती ने वहां मौजूद पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी की। अपने कर्तव्य-निर्वाह और मुस्तैदी का बखान करने के लिए ऐसी दलील या बहाना पुलिस अक्सर गढ़ लेती है। महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले की जांच का आदेश देते हुए भरोसा दिलाया है कि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। मगर ऐसे आश्वासन लोगों की नाराजगी को शांत करने की कवायद भर साबित होते रहे हैं।

इसलिए अमूममन न जांच का कोई सकारात्मक नतीजा निकलता है न पुलिस के व्यवहार में फर्क आया दिखता है। आम नागरिकों को बेवजह परेशान करने, वर्दी का रौब जमाने आदि से जुड़ी शिकायतें मिलती रहती हैं, फिर भी पुलिस सुधार संबंधी अनेक समितियों और आयोगों की सिफारिशें धूल खा रही हैं। सर्वोच्च अदालत की कई बार की हिदायत के बावजूद सोराबजी समिति की सिफारिशें लागू नहीं हो सकी हैं। इससे पुलिस को नागरिकों के प्रति संवेदनशील और अधिक जवाबदेह बनाने के लिए जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव ही जाहिर होता है। पर पुलिस सुधार एक अहम जनतांत्रिक तकाजा है।

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