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संपादकीयः सूखे में खेल

महाराष्ट्र के बड़े हिस्से को बेहाल कर देने वाले सूखे की मार आईपीएल जैसे खेल आयोजन पर भी पड़ गई है।

Author April 15, 2016 2:35 AM

महाराष्ट्र के बड़े हिस्से को बेहाल कर देने वाले सूखे की मार आईपीएल जैसे खेल आयोजन पर भी पड़ गई है। राज्य में पानी के जबर्दस्त संकट के मद्देनजर मुंबई हाईकोर्ट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को करारा झटका देते हुए तीस अप्रैल के बाद महाराष्ट्र में होने वाले सभी मैच अन्य राज्यों में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। इस फैसले के कारण बीसीसीआई को मई में होने वाले तेरह मैचों के लिए नए आयोजन स्थल अठारह दिन के भीतर तलाशने होंगे।

इतनी कम अवधि में नए स्थलों का चयन और वहां टूर्नामेंट की तैयारी करना बोर्ड के लिए हालांकि आसान नहीं होगा और इससे खेल प्रेमियों का निराश होना स्वाभाविक है। लेकिन इस फैसले के पीछे सूखे की विभीषिका के प्रति ध्यानाकर्षण और पानी की बर्बादी रोकने की अदालत की मूल मंशा की भी अनदेखी नहीं जानी चाहिए। महाराष्ट्र के अनेक जिले इन दिनों भयंकर सूखे से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। ऐसे में प्रति मैच साठ लाख लीटर पानी पी जाने वाले टूर्नामेंट के औचित्य पर सवाल उठना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता।

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अदालत ने खुद माना है कि आईपीएल मैच राज्य से बाहर स्थानांतरित करना कोई हल नहीं है लेकिन महाराष्ट्र में सूखे से निपटने की दिशा में यह एक शुरुआत हो सकती है। इस प्रकरण में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इन मैचों को स्थानांतरित करने से करीब 169 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। सवाल है कि क्या कोई भी आर्थिक नुकसान लाखों लोगों का जिंदगी से बड़ा कहा जा सकता है?

इस मामले का अफसोसनाक पहलू है कि बीसीसीआई ने हाईकोर्ट के फैसले को आईपीएल की नकारात्मक छवि बनाने के प्रयास के तौर देखा है। उसके सचिव का तो पलटवार के अंदाज में पूछना था कि क्या पांचसितारा होटलों के स्विमिंग पूल बंद कर दिए गए हैं? यह रवैया बताता है कि बीसीसीआई को राज्य में पड़ रहे सूखे की कोई परवाह नहीं है, उसे केवल मैचों के स्थानांतरण से होने वाले नुकसान और टीम मालिकों के स्वार्थों की अधिक चिंता है।

महाराष्ट्र सरकार का विरोधाभासी रवैया भी इस सिलसिले में परोक्ष रूप से उसके बीसीसीआई के साथ खड़े होने का सूचक है। इसका हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है। उसके मुताबिक राज्य सरकार एक तरफ तो कह रही है कि आईपीएल मैच महाराष्ट्र से बाहर कराने पर उसे आपत्ति नहीं है मगर दूसरी ओर क्रिकेट बोर्ड और अन्य क्रिकेट संघों से पिचों के रखरखाव में पानी के दुरुपयोग को लेकर पूछताछ भी नहीं कर रही है। यह इस बात का एक और उदाहरण है कि जिन मामलों में सरकार को खुद संज्ञान लेना चाहिए उनमें अदालतों को आदेश देने पड़ रहे हैं। बीसीसीआई अपने इस तर्क में दम देख रहा है कि छह महीने तक किसी ने महाराष्ट्र में आईपीएल आयोजन और सूखे का मुद््दा नहीं उठाया था, जबकि वहां कई अन्य खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे जिनके लिए पानी की जरूरत पड़ती रही। वह इस तर्क के साथ मैच स्थानांतरण और अन्य स्थलों पर उनके आयोजन की व्यावहारिक मुश्किलों का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट से फरियाद कर सकता है। वहां से फैसला चाहे जो आए, इस बीच प्रदेश के सूखा-पीड़ितों की फरियाद को किसी भी सूरत में अनसुना नहीं किया जाना चाहिए।

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