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संपादकीय: आतंक पर एकजुटता

पाकिस्तान दक्षिण एशिया में आतंकवाद की सबसे बड़ी पनाहगाह बन चुका है। वहां आतंकवादियों को प्रशिक्षित करने वाले सरगना खुलेआम सड़कों पर घूमते हैं और दुनिया में जगह-जगह अपनी साजिशों को अंजाम देने का प्रयास करते हैं। उसामा बिन लादेन तक ने वहीं पनाह ले रखी थी, जब अमेरिकी दस्ते ने उसे मार गिराया। पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियों से संबंधित तथ्यों से दुनिया का कोई देश अनजान नहीं है।

Updated: November 19, 2020 6:30 AM
भारत में आतंकवाद को प्रतिस्पर्धी उद्योग के रूप में न पनपने देने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी।

पांच देशों के संगठन ब्रिक्स के मंच से प्रधानमंत्री ने एक बार फिर आतंकवाद को रोकने के लिए एकजुटता की दरकार रेखांकित की। ब्रिक्स में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका सदस्य देश हैं। इस संगठन का गठन आपसी व्यापार बढ़ाने और सुरक्षा संबंधी विषयों पर सहयोग के लिए हुआ था। माना गया था कि ये पांचों देश अगर परस्पर सहयोग से काम करेंगे, तो दुनिया की आर्थिक महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका को चुनौती दी जा सकती है।

इस संगठन का लाभ भी इन देशों को मिलता रहा है। मगर आतंकवाद के मसले पर अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई है। प्रधानमंत्री ने संगठन के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए पाकिस्तान का नाम लिए बगैर कहा कि उन देशों को भी इसका जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, जो आतंकवाद को पनाह देते, पोसते रहे हैं। इस समस्या से लड़ने के लिए संगठित प्रयास की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने इससे संबंधित एक रणनीति भी पेश की। यह बात अंतरराष्ट्रीय मंचों से बार-बार दोहराई जाती रही है कि आतंकवाद के खिलाफ दुनिया के तमाम देशों को एकजुट होने की जरूरत है। यह भी छिपी बात नहीं है कि आतंकवाद की वजह से बहुत सारे देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। मगर कुछ देश अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के चलते संगठित नहीं हो पाते।

इस समस्या से पार पाने में संयुक्त राष्ट्र का पक्षपातपूर्ण रवैया भी आड़े आता रहा है। जहां अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के हित सीधे प्रभावित होते नजर आते हैं, वहां तो संयुक्त राष्ट्र महासभा इस समस्या को लेकर गंभीर नजर आता है, पर जहां उनके ऊपर सीधा असर नहीं पड़ता वहां शिथिलता बरती जाती है। इसलिए प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की नीतियों में बदलाव की उचित ही मांग उठाई। यह छिपी बात नहीं है कि भारत को आतंकी चुनौतियां सबसे अधिक पाकिस्तान से ही अधिक मिलती हैं।

इसके ढेर सबूत हैं, जो भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा के सामने भी पेश कर चुका है। भारत में हुई तमाम आतंकवादी घटनाओं के सरगना पाकिस्तान में पनाह पाए हुए हैं और वहां आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर चलाते हैं। इसके पुष्ट प्रमाण भी सौंपे जा चुके हैं। मगर संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य देश उसके खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई करने से परहेज करते रहे हैं। ब्रिक्स संगठन के सदस्यों में चीन भी शामिल है। भारत के साथ उसके संबंध इन दिनों कुछ अधिक कड़वे चल रहे हैं। वह पाकिस्तान को लेकर ज्यादा नरम रवैया अपनाता रहा है। जब भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान पर अंकुश लगाने की बात उठी है, चीन उसका विरोध करता रहा है। इसलिए प्रधानमंत्री की बातों का उस पर कितना असर पड़ेगा, कहना मुश्किल है।

पाकिस्तान दक्षिण एशिया में आतंकवाद की सबसे बड़ी पनाहगाह बन चुका है। वहां आतंकवादियों को प्रशिक्षित करने वाले सरगना खुलेआम सड़कों पर घूमते हैं और दुनिया में जगह-जगह अपनी साजिशों को अंजाम देने का प्रयास करते हैं। उसामा बिन लादेन तक ने वहीं पनाह ले रखी थी, जब अमेरिकी दस्ते ने उसे मार गिराया। पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियों से संबंधित तथ्यों से दुनिया का कोई देश अनजान नहीं है।

सब यह भी जानते हैं कि पाकिस्तान किस तरह भारत के खिलाफ आतंकवादियों का इस्तेमाल करता रहा है। फिर भी उसके खिलाफ कोई स्थायी और सख्त कदम उठाने से बचते रहे हैं। जब तक अमेरिका का उससे स्वार्थ सधता रहा, वह भी उसके प्रति नरम रवैया अख्तियार किए रहा। अब चीन उसे शह देता रहता है। ऐसे में प्रधानमंत्री की ताजा अपील ज्यादा गंभीर है।

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