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संपादकीय: समझौते के ध्रुव

भारत ने अब आत्मनिर्भर बनने का जो संकल्प किया है, उसे साकार करने के लिए घरेलू उद्योगों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है, जितना मुक्त व्यापार के लाभ अर्जित करना। भारत चीन की चालाकी भरी नीतियों को भली-भांति समझ चुका है। अगर ठोस नीतियों के अभाव में हम अपने दरवाजे दूसरे देशों के लिए खोल देंगे तो नतीजा क्या होगा, यह हम देख चुके हैं। सिर्फ बाजार और कारोबार के दम पर ही चीन भारत पर किस तरह से हावी होता रहा है, यह छिपा नहीं है।

कोरोना काल में घर जाने के लिए इधर-उधर भटकते लोग। फाइल फोटो।

आज जब कोरोना संकट की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था डांवाडोल है, तो ऐसे में एशिया प्रशांत क्षेत्र के पंद्रह देशों के बीच मुक्त व्यापार का समझौता हो जाना मामूली घटना नहीं है। भले इस मुक्त व्यापार के लिए सभी देशों को साथ लाने में चीन और उसकी नीतियों की भूमिका रही हो, लेकिन इतना तो निश्चित है कि इस करार के बाद दुनिया के एक क्षेत्र विशेष में व्यापारिक गतिविधियों की सूरत बदल सकती है। रविवार को क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसेप) के तहत चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिलीपीन सहित दक्षिण एशियाई देशों के संगठन- आसियान के सदस्यों ने एक दूसरे के लिए अपने कारोबारी दरवाजे खोलने पर सहमति दे दी।

यह समझौता इस लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है कि दुनिया का एक तिहाई से ज्यादा कारोबार अब एक महाद्वीप में जोर पकड़ेगा। दुनिया की एक तिहाई आबादी इन्हीं पंद्रह देशों में रहती है और इनके बीच कुल वैश्विक कारोबार का तीस फीसद व्यापार होता है। ऐसे में अगर इस समझौते के सदस्य देश अपने हितों के साथ एक दूसरे के हितों का भी खयाल रख कर चलें तो मुक्त व्यापार की दिशा में बढ़ते ये कदम एशियाई क्षेत्र को वैश्विक व्यापार का केंद्र बना सकते हैं।

कहने को भारत आरसेप में शामिल नहीं है। इस समझौते की नीतियों को भेदभाव भरा बताते हुए भारत ने पिछले साल इससे अपने को अलग कर लिया था। फिर भी इस समझौते में शामिल होने के लिए संगठन के सदस्य देशों ने भारत के लिए दरवाजे खुले रखे हैं। भारत ने अपने घरेलू कारोबारी हितों का हवाला देते हुए समझौते की शर्तों में सुधार पर जोर दिया था।

भारत का कहना था कि आरसेप के मसविदे में कई प्रावधान उसके घरेलू उद्योगों और कृषि को नुकसान पहुंचाने के साथ ही व्यापार घाटे को बढ़ा देंगे और ऐसे में भारत सिर्फ एक आयातक देश बन कर रह जाएगा। शुल्कों की व्यवस्था को लेकर भी भारत ने जो आपत्तियां उठाई थीं, उनका भी समाधान तब नहीं हो पाया था। जाहिर है, अगर अनुकूल स्थितियां बनती हैं तो भारत इसमें भागीदार बनेगा।

भारत ने अब आत्मनिर्भर बनने का जो संकल्प किया है, उसे साकार करने के लिए घरेलू उद्योगों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है, जितना मुक्त व्यापार के लाभ अर्जित करना। भारत चीन की चालाकी भरी नीतियों को भली-भांति समझ चुका है। अगर ठोस नीतियों के अभाव में हम अपने दरवाजे दूसरे देशों के लिए खोल देंगे तो नतीजा क्या होगा, यह हम देख चुके हैं। सिर्फ बाजार और कारोबार के दम पर ही चीन भारत पर किस तरह से हावी होता रहा है, यह छिपा नहीं है।

लेकिन यह भी सच्चाई है कि आज का दौर खुली अर्थव्यवस्था का है, ऐसे में बड़े व्यापारिक समझौतों से अपने को अलग रखना घाटे का सौदा भी है। कारोबारी नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जो घरेलू उद्योगों के संरक्षण और विकास पर केंद्रित होने के साथ ही विदेश व्यापार को बढ़ावा देने वाली हों। हां, इस बात का खयाल जरूर रखा जाना चाहिए कि मुक्त व्यापार की नीतियां हमें कहीं दूसरों पर निर्भर न बना दें, इसकी आड़ में दूसरे देश भारत पर हावी न हो जाएं।

चीन के साथ भारत के जैसे रिश्ते चल रहे हैं, उसमें मुक्त व्यापार को लेकर भारत की शर्तों और सुझावों पर चीन आसानी से कोई सहमति बनने देगा, फिलहाल इसकी संभावना नजर नहीं आती। लेकिन क्वाड के सदस्य देशों- आॅस्ट्रेलिया और जापान ने भी यह समझौता किया है। ऐसे में क्यों न ऐसी नीतियों पर काम हो, जो चीन को भारत के पक्ष में झुकने के लिए मजबूर करें!

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