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संपादकीयः लापरवाही की जेल

विडंबना यह है कि नियमों के तहत तमाम सख्ती बरते जाने के दावे के बावजूद देश भर में अलग-अलग जेलों से गैरकानूनी रूप से कैदियों को सुविधा मुहैया कराने की ऐसी खबरें आती रहती हैं।

जेल में बंद नंदू गिरोह के कुख्यात बदमाश विकास बक्करवाला को अवैध तरीके से सिम उपलब्ध कराने के आरोप में वहां के हेड वार्डन को भी गिरफ्तार किया गया है।

ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहे हैं, जिनमें जेलों में बंद सजायाफ्ता कैदियों को चोरी-छिपे कई सुविधाएं या सामान मुहैया करा दिए जाते हैं, जिनके इस्तेमाल की उन्हें इजाजत नहीं होती। जाहिर है, जेल के भीतर अगर किसी कैदी को इस तरह गैरकानूनी तरीके से कोई सामान मिल जाता है तो इसमें जेल में ही तैनात किसी कर्मचारी या अधिकारी की मिलीभगत होती है। लेकिन ऐसे कामों में लिप्त कर्मचारी क्या यह नहीं सोच पाते कि जेल में सजा काट रहा अपराधी उन सुविधाओं का इस्तेमाल करके फिर किसी बड़े अपराध को अंजाम दे सकता है और उसमें उन्हें भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है? ताजा मामला राजधानी दिल्ली के मंडोली जेल से सामने आया है, जहां जेल में बंद नंदू गिरोह के कुख्यात बदमाश विकास बक्करवाला को अवैध तरीके से सिम उपलब्ध कराने के आरोप में वहां के हेड वार्डन को भी गिरफ्तार किया गया है। खबर के मुताबिक जेल का हेड वार्डन एक सिम पहुंचाने के लिए दो हजार रुपए वसूलता था। उसी सिम के जरिए विकास जेल से ही कारोबारियों को रंगदारी के तौर पर लाखों रुपए पहुंचाने या फिर उनके परिवार को जान से मार डालने की धमकियां देता था।

सवाल है कि अगर कोई कैदी किसी अपराध का दोषी साबित होने के बाद सजा काट रहा होता है, लेकिन उसे वहां से भी रंगदारी, वसूली, फिरौती या हत्या कराने या उसकी धमकी देने में कोई परेशानी या हिचक नहीं होती है तो यह किस तरह की जेल और सजा काटने की व्यवस्था है? दरअसल, जेल में कैदियों पर नजर रखने के लिए जिन कर्मचारियों या अफसरों को बहाल किया जाता है, कई बार वही ऐसे अपराधियों के लिए सुविधा का जरिया बन जाते हैं। जेलों में सजायाफ्ता कैदियों को अवैध तरीके से मोबाइल या कोई दूसरे ऐसे संसाधन रखने की इजाजत नहीं है। जरूरत पड़ने पर जेल के फोन से बात कराने की व्यवस्था कराई जाती है। लेकिन वहां भी कुछ अपराधियों को न केवल मोबाइल, बल्कि मनचाहे तरीके से सिम हासिल करने में भी कामयाबी मिल जाती है तो इसमें जितना अपराध उनका है, उससे कम इसमें सहभागी होने वाले जेल के कर्मचारी का नहीं है। फिर एक गंभीर स्थिति यह है कि किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर सिम जारी करा कर किसी अपराधी को सौंप दिया जाता है तो उसका इस्तेमाल आपराधिक कामों में हो सकता है। ऐसे में जिस अन्य व्यक्ति के नाम पर सिम है, निर्दोष होने पर भी उसके कानूनी चपेट में आने की जिम्मेदारी कौन लेगा!

विडंबना यह है कि नियमों के तहत तमाम सख्ती बरते जाने के दावे के बावजूद देश भर में अलग-अलग जेलों से गैरकानूनी रूप से कैदियों को सुविधा मुहैया कराने की ऐसी खबरें आती रहती हैं। खासतौर पर राजनीतिकों के पास या शासन में अपनी पैठ रखने वाले रसूखदार अपराधियों के पास मोबाइल-टीवी या आराम की दूसरी सुविधाएं होने या अन्य तरह की अवांछित गतिविधियों के बारे में कई बार खुलासा हुआ है। कुछ राज्यों की जेलों में कैदियों द्वारा मोबाइल के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए जैमर लगाने जैसे उपाय भी किए गए। सवाल है कि सरकार या प्रशासन की ओर से इतने उपाय करने के साथ इस पर भी गौर क्यों नहीं किया जाता कि जेलों के भीतर कैदियों को ये सुविधाएं कैसे मिल जाती हैं! जाहिर है, जेलों में बंद सजायाफ्ता कैदियों पर लगाम लगाने के साथ-साथ ज्यादा जरूरी वैसे कर्मचारियों या अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करना है, जो अपराधियों के मददगार की भूमिका निभाते हैं। यह इसलिए भी कि जेल परिसर से अगर अपराधी अपनी मंशा को बदस्तूर अंजाम दे पाता है तो यह तुलनात्मक रूप से ज्यादा गंभीर स्थिति है।

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