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पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के बढ़ते दामों पर सोमवार को राज्यसभा में चर्चा कराने की विपक्ष की मांग को स्वीकार नहीं किया जाना सरकार के जनविरोधी रवैये को बताने के लिए काफी है।

Author Updated: March 9, 2021 5:21 AM
Inflationसांकेतिक फोटो।

पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के बढ़ते दामों पर सोमवार को राज्यसभा में चर्चा कराने की विपक्ष की मांग को स्वीकार नहीं किया जाना सरकार के जनविरोधी रवैये को बताने के लिए काफी है। इस वक्त महंगाई एक संवदेनशील मुद्दा बना हुआ है। पिछले दो महीने में जिस तेजी से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बेलगाम बढ़े हैं, उससे आम आदमी की कमर टूट गई है।

पहली बार पेट्रोल सौ रुपए और डीजल अस्सी रुपए के ऊपर निकल गया और दो महीने में रसोई गैस सिलेंडर सवा दो सौ रुपए तक महंगा हो गया। अगर चार ही दिन में रसोई गैस के दाम बढ़ाने की नौबत आ जा रही है, तो सरकार पर सवाल क्यों नहीं उठने चाहिए? ऐसे में अगर विपक्ष पेट्रोल, डीजल के बढ़ते दामों पर चर्चा कराने की मांग करता है तो इसमें क्या गलत है? नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने नियम 217 के तहत कार्यस्थगन का नोटिस देते हुए सभापति से पेट्रोल व डीजल के बढ़ते दामों पर चर्चा कराने की मांग की थी। लेकिन सभापति ने विनियोग विधेयकों पर चर्चा की बात कहते हुए उनके नोटिस को स्वीकार नहीं किया। इससे लगता है कि सरकार की नजर में महंगाई कोई महत्त्वपूर्ण मुद्दा नहीं रह गया है, भले आम जनता आहत होती रहे।

पिछले एक साल से लोगों को जिस तरह के गंभीर संकट से गुजरना पड़ रहा है, खासतौर पर आर्थिक मुश्किलों से, उसमें अब और महंगाई बर्दाश्त से बाहर है। करोड़ों परिवारों के पास काम-धंधा नहीं है और दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाना भी मुश्किल हो रहा है। महंगाई की मार से त्रस्त मध्यवर्ग और निम्न वर्ग का बड़ा हिस्सा बिना सबसिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों का इस्तेमाल करता है। डीजल महंगा होने का पहला असर माल ढुलाई पर पड़ता है और इससे रोजमर्रा की जरूरतों का हर सामान महंगा होता जाता है।

ऐसे में भी अगर सरकार महंगाई को चर्चा के लायक विषय नहीं समझती है, तो इसका मतलब साफ है कि वह महंगाई पर बात करने, सदन में चर्चा कराने से बच रही है। महंगाई जैसे ज्वलंत और आमजन से जुड़े मुद्दे पर अगर विपक्ष को सदन में ही चर्चा की अनुमति नहीं दी जाएगी तो वह कहां जाएगा? यह सही है कि सदन की कार्यवाही एक निर्धारित व्यवस्था के तहत संचालित होती है और होनी भी चाहिए, लेकिन उसमें मुद्दों की अहमियत को नजरअंदाज करना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। अगर सरकार महंगाई के मुद्दे पर चर्चा नहीं होने देना चाहती तो इसका मतलब साफ है कि वह इससे निपटने में अक्षम साबित हो रही है, पर इस हकीकत को स्वीकार नहीं कर रही।

पेट्रोलियम पदार्थों के दाम तय करने की नीति भले कुछ भी हो, लेकिन वह इतनी तर्कसंगत तो होनी ही चाहिए कि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा उससे प्रभावित न हो। क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम सामान्य स्तर पर बने रहने के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ रहे हैं और सरकारें अपना खजाना भर रही हैं। तीन दिन पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहली बार यह कहा कि केंद्र और राज्यों को मिल कर पेट्रोलियम उत्पादों पर लग रहे करों में कटौती करने के बारे में सोचना चाहिए। सच्चाई यह है कि सरकारें लोगों की मजबूरी का भरपूर फायदा उठा रही हैं। खाना-पीना कोई बंद नहीं करने वाला, यात्रा लोग करेंगे ही, जरूरत का सामान खरीदेंगे ही, ऐसे में करों की आड़ में आमजन की जेब से जितना पैसा पैसा खींचा जा सकता है, खींच लें। यह बेरहमी की पराकाष्ठा है। क्या ऐसी सरकारें ही कल्याणकारी होती हैं?

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