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संपादकीय: भुखमरी के सामने

विश्व खाद्य कार्यक्रम के प्रमुख ने कहा है कि अगला वर्ष इस साल की तुलना में ज्यादा खराब होगा और अगर अरबों डॉलर की सहायता नहीं मिली तो 2021 में भुखमरी के मामले बेतहाशा बढ़ जाएंगे। वैश्विक महामारी से पैदा हुए संकट के बावजूद दुनिया के ज्यादातर समर्थ देशों और उनके नेताओं ने इस साल धन दिया, अलग-अलग मदों में राहत पैकेज दिए। लेकिन यह सरोकार जैसा 2020 में दिखा, अगले साल इसके आसार नहीं दिख रहे।

कोरोना काल में भोजन करने के लिए जद्दाेेजहद करते लोग। फाइल फोटो।

पिछले कई दशक से दुनिया के सामने भुखमरी की बढ़ती समस्या एक बड़ी चुनौती बन कर उभरी है। अमूमन हर अगली वैश्विक भुखमरी सूचकांक की रिपोर्ट यह बताती है कि अब तक इस संकट से उबरने के उपाय संतोषजनक नहीं रहे हैं। यह समस्या सामान्य स्थितियों में पहले ही गहरा रही थी, लेकिन इस साल मार्च में कोरोना महामारी की वजह से लागू की गई पूर्णबंदी के बाद हालात और ज्यादा जटिल हो गए हैं। अब विश्व खाद्य कार्यक्रम की ओर से जो आशंका जताई गई है, अगर उस पर समय रहते गौर नहीं किया गया और विश्व के समर्थ देशों ने सक्रियता नहीं दिखाई तो आने वाले समय में खासतौर पर गरीब देशों के कमजोर नागरिक समुदायों को भयावह स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।

विश्व खाद्य कार्यक्रम के प्रमुख ने कहा है कि अगला वर्ष इस साल की तुलना में ज्यादा खराब होगा और अगर अरबों डॉलर की सहायता नहीं मिली तो 2021 में भुखमरी के मामले बेतहाशा बढ़ जाएंगे। वैश्विक महामारी से पैदा हुए संकट के बावजूद दुनिया के ज्यादातर समर्थ देशों और उनके नेताओं ने इस साल धन दिया, अलग-अलग मदों में राहत पैकेज दिए। लेकिन यह सरोकार जैसा 2020 में दिखा, अगले साल इसके आसार नहीं दिख रहे।

यही वजह है कि विश्व खाद्य कार्यक्रम और उसके प्रमुख लगातार वैश्विक नेताओं से इस बारे में बात कर रहे हैं और धन के अभाव में आने वाले वक्त में खराब होते हालात के बारे में दुनिया को आगाह कर रहे हैं। यह एजेंसी विश्व के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्षों या फिर आपदा के दौरान संकट से घिरे या शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों की मदद करती है। लाखों भूखे लोगों को खाने-पीने के सामान मुहैया करवाने के लिए इसके कर्मचारी कई तरह के जोखिम के बीच काम करते हैं।

भुखमरी का सामना करने में इस संस्था के प्रयासों को देखते हुए ही इसे शांति के नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया है। करीब छह महीने पहले संयुक्त राष्ट्र भी कोरोना महामारी के चलते भुखमरी का संकट गहराने की चेतावनी दे चुका है। मगर गरीबी और दूसरे कारणों से इस समस्या की गंभीर स्थिति में कुछ देशों में एक ओर जरूरतमंद आबादी भूख से दो-चार थी, तो दूसरी ओर वहां गोदामों में पड़ा अनाज सड़ कर बर्बाद हो रहा था। जाहिर है, व्यवस्थागत लापरवाही और सरकारों की इच्छाशक्ति के अभाव ने भुखमरी की समस्या गहराने में ही अपनी भूमिका निभाई है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि कई देश अपने स्तर पर वैश्विक भुखमरी से लड़ने के लिए संबंधित संस्थाओं को सहायता राशि उपलब्ध कराते रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि पिछले आठ-नौ महीनों से दुनिया भर में जैसे हालात बने हुए हैं, महामारी का सामना करने के क्रम में लगभग सभी देशों की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है, उसमें उनसे पहले की तरह मदद की उम्मीद शायद नहीं की जा सकती है।

ज्यादातर देश अपनी बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्था को संभालने में ही खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। लेकिन अगर इन हालात में मदद के अभाव का असर बढ़ती भुखमरी से लड़ाई पर पड़ना शुरू हुआ तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैसा संकट खड़ा हो सकता है। पहले ही विश्व के बहुत सारे विकासशील और गरीब देशों में खाद्यान्न के अभाव के चलते एक बड़ी आबादी के सामने जीने तक की स्थितियां मुश्किल हो चली हैं। अब अगर धन की कमी के चलते भुखमरी पर काबू पाने के अभियान बाधित होते हैं, तो इससे एक समस्या से बचाव के क्रम में दूसरे संकट के गहराने के हालात बनेंगे।

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