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मुश्किल में फुटबाल

फीफा के इस कठोर कदम ने भारतीय खेल महासंघों की कार्य-संस्कृति को भी उजागर किया है।

मुश्किल में फुटबाल

विश्व फुटबाल की सर्वोच्च नियामक संस्था फीफा ने अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ (एआइएफएफ) को निलंबित कर इस बात का कड़ा संदेश दिया है कि खेल महासंघ को उसके नियमों का पालन करना ही होगा। फीफा की यह कार्रवाई मामूली नहीं है। भारतीय फुटबाल के पचासी साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब भारतीय फुटबाल महासंघ के साथ इस किस्म का बर्ताव किया गया हो। इसका मतलब साफ है कि अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ फीफा के निर्धारित नियमों का पालन नहीं कर रहा था और संस्था चलाने की जिम्मेदारी संभालने वाले अपनी मनमर्जी चलाते रहे।

ऐसे में फीफा के सामने शायद कोई चारा रह भी नहीं गया होगा। फीफा के इस कठोर कदम ने भारतीय खेल महासंघों की कार्य-संस्कृति को भी उजागर किया है। जाहिर है, इससे देश का फुटबाल जगत, खिलाड़ी और इस खेल के प्रेमी-प्रशंसक सबको धक्का लगा है। चिंता की बात यह भी है कि फीफा के इस फैसले से भारतीय फुटबाल के सामने कई संकट खड़े हो जाएंगे। अक्तूबर में होने वाले अंडर-17 महिला विश्व कप की मेजबानी भारत के हाथ से छिन गई है। जब तक फीफा निलंबन वापस नहीं ले लेता, तब तक भारत की पुरुष और महिला फुटबाल टीम किसी भी देश के साथ कोई खेल नहीं खेल सकेगी। भारत के फुटबाल क्लब भी किसी भी अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में हिस्सा नहीं सकेंगे। भारतीय फुटबाल का यह भारी नुकसान है।

दरअसल, अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ लंबे समय से जिस रास्ते पर चल रहा था, उसमें एक न एक दिन यह होना ही था। कहना न होगा कि विवाद की जड़ इस पर कब्जे को लेकर रही है। दिसंबर 2020 में जब इसके अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल का कार्यकाल खत्म हो गया था, तो कायदे से उन्हें पद छोड़ देना चाहिए था। लेकिन वे पद पर डटे रहे। जबकि वे अपने तीन कार्यकाल पूरे कर चुके थे। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद इस साल मई में पटेल ने इस कुर्सी को छोड़ा। सवाल तो इस बात का है कि राजनेता खेल संघों की कुर्सी से चिपके क्यों रहना चाहते हैं?

अगर पटेल पहले ही नियमों के मुताबिक चलते और पद छोड़ देते तो नए चुनावों का रास्ता साफ हो जाता और ऐसे विवाद की नौबत ही नहीं आती। लेकिन देखने में अब तक यही आता रहा है कि खेल संघों के अध्यक्ष व दूसरे पदों पर कुंडली मार कर बैठने की प्रवृत्ति गहरी जड़ें जमा चुकी है। हैरत की बात तो यह कि तमाम नियमों और हर खेल संगठन के अपने संविधान होने के बावजूद ये संस्थाएं भ्रष्टाचार और अराजकता का अड्डा बनी हुई हैं। ऐसे मामलों से निपटने के लिए सरकारी तंत्र भी लाचार ही नजर आता है। वरना क्यों नहीं खेल संगठनों के चुनाव समय पर होते और क्यों नहीं ये संस्थाएं नियमों के तहत काम करतीं?

मामला सिर्फ अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ तक ही सीमित नहीं है। ज्यादातर खेल संगठनों पर ताकतकवर लोगों का कब्जा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे लोगों को सत्ता का संरक्षण हासिल रहता है। इसलिए यह सवाल आज भी बना हुआ है कि खेल संगठनों को कुछ लोगों की जागीर बनने से रोका कैसे जाए? आखिरकार अब भी तो प्रशासकों की समिति (सीओए) फीफा की शर्तों पर चुनाव कराने के लिए तैयार हुई। क्या यही काम पहले नहीं हो सकता था? खेल संगठनों में खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों और खेल विशेषज्ञों के बजाय अगर राजनीति और सत्ता से जुड़े लोग इनमें जमे रहेंगे तो कैसे भारत खेलों में दूसरों से आगे निकल पाएगा?

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