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मुसीबत की बरसात

पिछले दिनों बेमौसम बरसात से फसलों को हुए नुकसान का मुद्दा बुधवार को लोकसभा में उठा। कुछ सदस्यों ने किसानों के लिए मुआवजे की मांग भी की। लेकिन सरकार की ओर से इस बारे में कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला। इससे पहले भी कई राजनीतिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने फसलों को हुए नुकसान के मद्देनजर […]
Author March 13, 2015 10:28 am

पिछले दिनों बेमौसम बरसात से फसलों को हुए नुकसान का मुद्दा बुधवार को लोकसभा में उठा। कुछ सदस्यों ने किसानों के लिए मुआवजे की मांग भी की। लेकिन सरकार की ओर से इस बारे में कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला। इससे पहले भी कई राजनीतिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने फसलों को हुए नुकसान के मद्देनजर मुआवजे की मांग उठाई थी। उनका यह भी कहना है कि बेमौसम बारिश को प्राकृतिक आपदा माना जाए। फिलहाल इस तरह की बारिश आपदा की श्रेणी में नहीं आती। निश्चय ही इस बारे में चले आ रहे प्रावधान को संशोधित करने की जरूरत है। अगर ओलावृष्टि आपदा मानी गई है, तो बेमौसम की बारिश क्यों नहीं, जबकि फसल की बरबादी दोनों में होती है। पिछले दिनों बेवक्त की बरसात से अनेक राज्यों में फसलों को भारी नुकसान हुआ है। महाराष्ट्र के कई जिलों में फलों की पैदावार पर भी इसका बुरा असर पड़ा है।

जब भी ऐसी स्थिति आती है, मुआवजे का सवाल उठता है। राज्य सरकारें केंद्र से वित्तीय सहायता की मांग करती हैं। कई बार उनकी अपेक्षा किसी हद तक पूरी भी हो जाती है।

मगर बेमौसम बारिश को आपदा की श्रेणी में रखने का तकाजा भुला दिया जाता है। सरकारें नहीं चाहती होंगी कि उन पर राहत-कार्यों का दबाव पड़े। इस रवैए को देखते हुए क्या यह कहा जा सकता है कि वे किसानों के प्रति संवेदनशील हैं? विभिन्न राज्यों में हुई फसल की बरबादी का अभी तक ठीक से आकलन भी नहीं किया गया है। एक दूसरी वाजिब मांग यह भी उठी है कि मौसम आधारित फसल बीमा की योजना शुरू की जाए। देश में 1979 में फसल बीमा की शुरुआत प्रयोग के तौर पर हुई थी। यह पायलट योजना पांच साल तक रही।

फिर 1985 में व्यापक फसल बीमा योजना लाई गई। पर इससे भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। नाकामियों के दो खास कारण रहे हैं। एक तो यह कि ये योजनाएं व्यावहारिक नहीं रही हैं। क्षतिपूर्ति के दावों की मंजूरी के लिए ऐसी शर्तें थोपी जाती हैं कि बीमाधारक बेकार के चक्कर काटने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। दूसरे, काफी समय से खेती घाटे का धंधा हो चुकी है। ऐसे में आम किसानों के लिए प्रीमियम चुकाना संभव नहीं हो सकता।

अमेरिका में फसल बीमा के प्रीमियम का दो तिहाई हिस्सा सरकार चुकाती है, जबकि वहां खेती करने वाले लोगों और भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। भारत में प्रीमियम के अधिकांश हिस्से की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर सरकार किसानों के लिए राहत का एक टिकाऊ उपाय कर सकती है।

कृषि क्षेत्र के संकट से निपटने के लिए अपनी सरकार के पास सबसे खास नुस्खा यही होता है कि रियायती ब्याज दर पर दिए जाने वाले कृषि-ऋण की राशि में इजाफा कर दिया जाए। मगर इस सुविधा का काफी लाभ फार्महाउसों के मालिकों और एग्रो बिजनेस के कारोबारियों के पास चला जाता है। फिर, जब तक खेती पुसाने लायक न बने, कृषि-कर्ज की उपलब्धता कोई कारगर समाधान नहीं हो सकती।

किसान की हालत यह है कि जब मौसम की प्रतिकूलता या कीट-प्रकोप आदि कारणों से फसल चौपट होती है तब तो वह मुसीबत में होता ही है, जब पैदावार अच्छी हो तब भी अक्सर वाजिब दाम न मिलने से वह खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। उद्योगों और आधारभूत ढांचे के विस्तार को ही विकास का पर्याय मान लिया गया है। पर विकास का मतलब कृषि की बेहतरी और खाद्य सुरक्षा भी है।

 

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